टाट्रा ट्रक और सेना

                                                                       देश के सेनाध्यक्ष रहते हुए जनरल वीके सिंह ने किस हद तक जाकर घूस के सनसनी खेज आरोप लगाकर किस तरह से देश की रक्षा आवश्यकताओं को पलीता लगाया था अब यह बात धीरे धीरे सामने आ रही है. टाट्रा जैसे विश्व प्रसिद्द विश्वसनीय ट्रक के बारे में उन्होंने जिस तरह से यह कहकर मामले को गर्मा दिया था कि मानक से कम क्षमता के ट्रक आपूर्ति करने के लिए उनको रिश्वत की पेशकश की गयी थी उससे रक्षा मंत्रालय से लगाकर संसद तक में हंगामा खड़ा हो गया था पर उस मामले में कहीं से भी आरोप साबित नहीं हो पाये पर भारतीय सेना के विश्वसनीय वाहन की आपूर्ति और रखरखाव पर बुरा असर अवश्य ही पड़ा था. आज इस मामले का कथित खुलासा करने वाले सिंह सरकार में मंत्री हैं और सरकार के सामने इतने बेहतर वाहन को नकारने का कोई ठोस कारण भी नहीं है तो अब वह इससे चरणबद्ध तरीके से प्रतिबंधों को हटाने की बात करना शुरू कर चुकी है. रक्षा सौदे जिस स्तर पर भरपूर जांच के बाद ही फाइनल किये जाते हैं उसमें भाजपा ने जिस तरह की राजनीति की थी वह अब उसके सामने है.
                                         भारतीय रक्षा उद्योग अपने आप में बहुत ही बड़े स्तर पर खुद ही विकसित हो सकता है पर जब तक देश इस क्षेत्र में आत्म निर्भरता की तरफ न बढ़ जाये तब तक उसे विदेशी कम्पनियों के साथ अनुबंधों के अंतर्गत ही अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सोचना पड़ेगा. यह कोई पहली बार नहीं हुआ है जब गुणवत्ता में श्रेष्ठ सौदे को केवल सनसनी फ़ैलाने के लिए ही इस तरह से दुरूपयोग के द्वारा सरकार को नीचा दिखाने की कोशिश की गयी है. इससे पहले बोफोर्स तोपों के बारे में भी इसी तरह की बातें की गई थीं कि भ्रष्टाचार के माध्यम से घटिया तोपों की खरीद कर ली गयी थी जबकि कारगिल युद्ध के समय इन्हीं कथित घटिया तोपों ने अटल सरकार की इज़्ज़त बचाने का काम भी किया था और वह उन सभी मानकों पर भी खरी उतर गयी थी जिनके बारे में सेना के कुछ लोगों को भी संदेह हुआ करता था. वीपी सिंह ने जिस तरह बोफोर्स मामले में राजीव गांधी सरकार पर आरोप लगाये थे और भाजपा ने उनका समर्थन किया था उसके बाद आज तक किसी को उनकी गुणवत्ता के स्तर पर कुछ भी नहीं मिल पाया है.
                                     आज रक्षा मंत्री को यह लग रहा है कि देश की रक्षा खरीद नीति में कोई कमी है क्योंकि हथियार निर्माता कम्पनियों द्वारा अपने एजेंटों को भुगतान किया जाना एक वैश्विक प्रक्रिया है इसमें भारत चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता है. इन मामलों में दलाली के स्वरुप को केवल बदला ही जा सकता है जिसके लिए सरकार ने संकेत देने शुरू कर दिये हैं. हर सौदे में एक निश्चित राशि को एजेंटों को भुगतान किये जाने की वैश्विक नीति के तहत अब देश में भी इसे एक स्तर तक कानूनी रूप दिया जाने वाला है जिससे आने वाले समय में रक्षा सौदों में पारदर्शिता बढ़ने के साथ ही पूरी डील का सच भी सबके सामने आ जायेगा जिससे दलाली के आरोप नहीं लग सकेंगें. अपने रक्षा मंत्री के कार्यकाल में एंटोनी ने जिस स्तर तक सफाई का काम कर दिया है अब किसी भी रक्षा मंत्री के लिए उन पर आगे बढ़ना बहुत ही आसान होने वाला है केवल सरकार के बड़े नीतिगत परिवर्तनों के साथ अब रक्षा सौदों को काफी पारदर्शिता के साथ पूरा किये जाने की तरफ भी बढ़ा जा सकता है. देश की इन आवश्यकताओं के लिए सभी राजनैतिक दलों को घटिया राजनीति से आगे बढ़कर सेना और सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए एक मत से कदम बढ़ाने चाहिए.            
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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