संघ के मोदी पर नरम तेवर

                                                       केंद्र में सुशासन के मुद्दे पर चुनाव जीतने की बात कहने वाले पीएम मोदी के लिए दिल्ली के छतरपुर के अध्यात्म साधना केंद्र में संघ की सालाना बैठक में जिस तरह से मोहन भगवत ने स्वयंसेवकों को यह सन्देश दिया है कि वे कम संघ के कार्यकर्त्ता कम एक साल तक सरकार के लिए विवादित मामलों पर समस्याएं खडी न करने उससे आजकल माहौल गर्म करने की कोशिशों पर कितना विराम लग पायेगा यह तो समय ही बताएगा पर फिलहाल संघ के तेवर कुछ ढीले ही रहने वाले हैं. सरकार बनाने के लिए चुनाव प्रचार के समय संघ द्वारा समर्थन दिए जाने पर कहा जाता है कि भी मोदी ने यह आश्वासन लिया था कि उनको सरकार अपने हिसाब से चलने के पूरे अवसर दिए जायेंगें और उसमें दखल नहीं दिया जायेगा पर सरकार के प्रारंभिक महीने जिस तरह से बीते हैं उससे ऐसे कोई संकेत नहीं मिलते हैं कि संघ मोदी पर अपने एजेंडे के लिए दबाव नहीं बनाने वाला है. घर वापसी पर तो मामला इतना बिगड़ गया कि मोदी ने इस्तीफ़ा देने तक की धमकी भी दे डाली जिसके बाद ही संघ की कोशिशों पर कुछ अनमनी सी रोक दिखाई दे रही है.
                            यह सही है कि सत्ता परिवर्तन के लिए देश की जनता ने भाजपा को मोदी के नेतृत्व में समर्थन दिया था पर साथ ही दूर दराज़ के किसी भी क्षेत्र में लोगों को संघ द्वारा यह भी समझाया जा रहा था कि भाजपा की सरकार बनने पर उसका एजेंडा लागू किया जायेगा जिससे देश में हिंदुत्व से जुड़े मुद्दों को प्रखरता से उभारा जायेगा. जिन आम लोगों को इस तरह से समझाया गया था अब उनका और संघ के कार्यकर्ताओं का दबाव ही है कि घर वापसी और लव जिहाद जैसे मुद्दों पर ज़मीनी नेता और कार्यकर्त्ता बोलने से परहेज़ नहीं कर रहे हैं और उनके द्वारा विभिन्न स्तरों पर प्रयास पूरी तरह से जारी हैं. संघ को यदि भाजपा के सुशासन के दावों को पूरा करना है तो उसे अपने इन लोगों पर पूरी तरह से लगाम लगानी ही होगी क्योंकि फिलहाल अब देश में कोई चुनाव नहीं होने वाला है और आम जनता के साथ पूरी दुनिया भी साल पूरा होने पर मोदी सरकार के प्रदर्शन पर नज़रें गड़ा चुकी होगी इसीलिए भविष्य में आने वाली चुनौतियों को समझते हुए मोदी अपनी तरह से दबाव की राजनीति शुरू कर चुके हैं.
                        समाज में सनसनी फैलाकर चुनावों में वोट तो बटोरे जा सकते हैं पर उनको किसी भी तरह से बचाये रखने के लिए जनता की आकांक्षाओं पर खरा उतरने की भी ज़रुरत होती है. यूपी और राजस्थान के उदाहरण से इसे आसानी से समझा भी जा सकता है जहाँ पर सरकारें चुनावों में बड़े अंतरों से लगतार हार रही हैं क्योंकि एक दल की सरकार से ऊबने के बाद जनता के पास जो भी विकल्प उपलब्ध होता है जनता उसके ही साथ चली जाती है. वर्तमान में मोदी के सामने देश की आर्थिक नीतियों के साथ सुधारात्मक कोशिशें करने के प्रयास भी पूरी दुनिया की गतिविधियों के अनुसार ही परिणाम देने वाले हैं तो उस स्थिति के लिए सरकार को तैयार करने के लिए ही मोदी कठोर शब्दों में बोल रहे हैं तथा अपने स्तर से विवादित मसलों से बचने की कोशिशें करने में लगे हैं. संसद में यकीनन वे मज़बूत बहुमत के पीएम हैं पर उनके लिए आज बड़ा खतरा संघ की तरफ से ही है क्योंकि संख्या में विपक्ष उनके खिलाफ कुछ नहीं कर सकता है पर संघ की हरकतों से संसद किस तरह से बाधित हो सकती है और सरकार को महत्वपूर्ण निर्णयों पर अध्यादेश जारी करने पड़ सकते हैं यह शीतकालीन सत्र में विपक्ष को आसानी से पता चल चुका है.         मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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