विधान-सभा चुनावों के निहितार्थ

                                                             इस साल चुनावों की कड़ी में आखिरी जम्मू और कश्मीर और झारखण्ड में जनता ने संभवतः अपने मन की उस इच्छा को भी दिखाया है जिसके चलते देश में लोकतंत्र लगातार मज़बूत होता जा रहा है. अपने जन्म के समय से ही राजनैतिक अस्थिरता का शिकार रहे झारखण्ड ने जिस तरह से इस बार लगभग एक तरफ़ा होते हुए भाजपा को सबसे बड़े दल के रूप में चुना है उससे यही लगता है कि अब झारखण्ड में विकास का पूरा दारोमदार उस पर ही आने वाला है क्योंकि अभी तक जिस तरह से गठबंधन में शामिल दलों के चलते कभी भी राज्य में कोई भी स्थायी सरकार नहीं आ पायी थी इस बार के चुनावों एक बाद उस धुंध को जनता ने काफी हद तक ख़त्म कर दिया है साथ ही आज भी वहां के छोटे दलों की प्रासंगिकता में कोई कमी नहीं आई है यह भी स्पष्ट हो गया है. लोकसभा चुनावों के प्रदर्शन के बाद भाजपा के प्रदर्शन को उस स्तर का तो नहीं माना जा सकता है पर यही अंतर है जो लोकसभा और विधान सभा चुनावों में स्पष्ट रूप से सामने आता है और राज्य की आकांक्षाएं राष्ट्रीय मुद्दों पर भारी पड़ जाया करती हैं.
                                                           वर्तमान समय में जिस मज़बूती के साथ जनता भाजपा के समर्थन में खड़ी है उसका मुख्य कारण उसका अन्य दलों से मोहभंग होना भी है क्योंकि विभिन्न दलों में अपने आगे जनता को गौण समझने की प्रवृत्ति जिस तरह से पनपनी शुरू हुई है यह उसके समापन की तरफ बढ़ते हुए कदम दिखाई देते हैं. देश के लिए दो अखिल भारतीय दलों की उपस्थिति आने वाले समय में किस तरह का बदलाव लाने वाली है इस बात के संकेत अब मिलने शुरू हो गए हैं क्योंकि पांच वर्ष पहले जिस कांग्रेस को जनता ने दोबारा सत्ता चलाने का हक़ दिया था आज वह उसे हर राज्य में पीछे ही करती जा रही है. अब कांग्रेस खुद को पूरे देश में किस तरह से खड़ा कर पाती है यह तो आने वाला समय ही बताएगा पर जम्मू कश्मीर में वही ऐसा दल साबित हुई है जिसकी पूरे राज्य में उपस्थिति भी है जबकि नेशनल कॉन्फ्रेन्स और पीडीपी सहित भाजपा का प्रदर्शन क्षेत्र विशेष में ही बहुत अच्छा रहा है. राज्य के दोनों दल आज भी पूरे राज्य में अपने को स्थापित नहीं कर पाये हैं जो कि उनकी नाकामी ही कही जा सकती है.
                                                       वर्तमान में भाजपा केंद्र में सरकार चला रही है तो इस स्थिति में पीडीपी के पास उसके साथ जाने का विकल्प सबसे बढ़िया हो सकता है क्योंकि उस परिस्थिति में वह केंद्र से सही मायनों में नीतियां बनवाने की तरफ भी बढ़ सकती है पर साथ ही यह भी नहीं भुलना चाहिए कि भाजपा के शीर्ष पर अब पहले जैसा घाटी में भी स्वीकार्य नेतृत्व नहीं है जिसके चलते भी पीडीपी के कदम कहीं ठिठक सकते हैं. महबूबा मुफ़्ती ने जिस तरह से अपने सभी रास्ते खुले हुए छोड़ रखे हैं तो उस स्थिति में भाजपा के साथ जाना उनके लिए उतना आसान नहीं होने वाला है क्योंकि जम्मू के एकतरफा सपोर्ट के बाद भाजपा पर भी इस बात का दबाव बनने ही वाला है कि वह भी धारा ३७० समेत कश्मीरी पंडितों की वापसी पर कोई ठोस काम करे और यही मसले ऐसे होने वाले हैं जिन पर भाजपा पीडीपी गठंबंधन के सामने समस्याएं आ सकती है. वैसे न्यूनतम साझा कार्यक्रम के माध्यम से विवादित मसलों को किनारे कर ये दोनों दल एक साथ आ सकते है. पीडीपी के लिए कांग्रेस के साथ जाना हर तरह से घाटी में समस्याओं को कम कर सकता है क्योंकि इससे जम्मू क्षेत्र से बनने वाले दबाव को सरकार आसानी से झेल सकती है. राज्य के विकास के लिए मज़बूत और पक्के कार्यक्रम के साथ सरकार बने आज यही समय की आवश्यकता भी है.       
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

About Dr Ashutosh Shukla

Only simple.....
यह प्रविष्टि अधिकार. कर्तव्य, उपयोग, उम्मीद, पुनर्वास, राजनीति, सरकार, सुरक्षा में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s