"घर वापसी"- मानसिक स्थिति या सामाजिक समस्या ?

                                                देश की संसद के ऊपरी सदन से लगाकर पीएम मोदी, सत्ता पक्ष, विपक्ष, राज्य सरकारें और प्रशासन के सामने आज कल घर वापसी को लेकर जिस तरह से रोज़ ही समस्याएं आ रही हैं उससे यही लगता है कि इस तरह के कार्यक्रमों के साथ देश भर में एक मुहिम चलकर संघ अपनी बातों को आम हिन्दू जनमानस तक पहुँचाने में लगा हुआ है. यह सही है कि जिन भी लोगों का किसी भी काल में दबाव या लालच के चलते धर्म परिवर्तन किया गया वह मानवता के खिलाफ था और यदि आज भी लोग धर्म परिवर्तन करने में लगे हुए हैं तो उनके सामने किस तरह की परिस्थितियां हैं इससे सही तरह से समझने और निपटने की ज़रुरत भी है. आज भी देश में किसी हिन्दू के धर्म परिवर्तन पर समाज उतना आगे बढ़कर नहीं सोचता है जितना मुस्लिम या ईसाई के तो आखिर ऐसे क्या कारण हैं कि देश में एक जैसे कानून के होने के बाद भी धर्म परिवर्तन में इस तरह से समाज का दोहरा चरित्र सामने आता है और शिक्षित से अशिक्षित तक सभी लोग इस तरह के मामलों में अलग तरह से रूचि दिखाना शुरू कर देते हैं ?
                                       पिछले दिनों दो ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं जो समाज में रहने वाले कुछ लोगों के पूर्वाग्रह को ही दिखती हैं हैदराबाद में पुलिस ने बिहार के रहने वाले एक छात्र को दाढ़ी बढ़ाये देखने के बाद जिस तरह से उनके मुसलमान होने से सम्बंधित प्रश्न पूछे और यह भी कहा कि यदि मुस्लिम नहीं हो तो दाढ़ी क्यों बढ़ाए हो तो इससे क्या कहा जाये ? कुछ पुलिस कर्मियों ने उस छात्र के थप्पड़ भी मारा जिसके बाद छात्रों ने थाने के सामने प्रदर्शन किया तब उसे आश्वासन मिल सका कि उनकी बात भी सुनी जाएगी. दूसरी तरफ गुजरात के सुंदरनगर ज़िले में मशहूर गायक मीर परिवार की सदस्य फरीदा मीर के वापस हिन्दू धर्म स्वीकार करने के बारे में घोषणा कर दी गयी और बाद में परिवार की तरफ से इसका विरोध करते हुए कहा गया कि फरीदा लोक गायक की हैसियत से एक कार्यक्रम में अपनी प्रस्तुति देने गयी थीं और इससे अधिक कुछ भी नहीं था और इस मामले में वीएचपी द्वारा भ्रामक प्रचार किया जा रहा है. स्थानीय पुलिस प्रशासन ने भी इस मामले से अनभिज्ञता दिखाई है और कहा है कि उसके पास धर्म परिवर्तन करने के लिए कोई आवेदन नहीं आया है.
                                      कहने को तो यह देश के दो अलग अलग राज्यों की घटनाएँ हैं पर जिस तरह की मानसिकता का प्रदर्शन इनमें सामने आया है वह आखिर किस तरह के हिन्दू धर्म को आगे बढ़ाने में सहायक होने वाला है ? इस तरह की बातों के लगातार बढ़ने और संघ से जुड़े संगठनों की इस पर तीव्र प्रतिक्रिया सामने आने से समाज में विभाजन की स्थिति और भी आगे ही बढ़ने वाली है. किसी के भी धर्म के आधार पर इस तरह का भेदभाव या दुष्प्रचार करना कहीं से भी सही नहीं कहा जा सकता है वो चाहे हिन्दू मुस्लिम या ईसाई कोई भी क्यों न हो. आज आईएस की बर्बरता के सामने आने के बाद भी जिस तरह से बर्बरता को पसंद करने वाले और पश्चिमी देशों में रहने वाले युवक भी उसकी तरफ खिंच रहे हैं तो क्या पूरा समाज उधर जा रहा है ? समाज में हर मानसिकता के लोग हर धर्म में पाये जाते हैं आम हिन्दू धर्म को लेकर जहाँ बहुत ही सहिष्णु है वहीं मुस्लिम धर्म से जुडी किसी भी बात में किसी भी तरह की आलोचना को सहजता से नहीं लेते हैं, भारत में ईसाइयों ने सदैव ही बलपूर्वक काम करने के स्थान पर अपनी छवि सेवा भाव में ढालकर अपने लिए मार्ग खोलने के काम किये हैं. अच्छा हो कि खुद पीएम संघ के संगठनों के लिए एक सीमा रेखा खींच दें जिससे उनके सुशासन के मुद्दे पर धार्मिक कट्टरता कहीं से भी हावी न होने पाये पर समाज को विभाजित कर राजनीति करने में जो आसानी होती है वह संगठित समाज से नहीं की जा सकती है.               
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

About Dr Ashutosh Shukla

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