आवश्यक विधायी कार्य और सदन

                                                         देश में लोकतंत्र के मज़बूत होने और बेहतर राजनैतिक समझ के साथ जहाँ पूरी दुनिया में हमारे लोकतंत्र को एक अलग ही स्थान दिया है उसके बाद सदन के लिए निर्वाचित होने वाले सदस्यों की ज़िम्मेदारी और भी अधिक बढ़ जाती है. पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह से केंद्र में गठबंधन सरकारों का ही दौर चलता रहा है उस पर नज़र डालें तो सदन में काम काज करने में सत्ता पक्ष को रोकने के लिए जिस तरह से हरकतें की जाने लगी हैं उनका किसी भी तरह से समर्थन नहीं किया जा सकता है. अब जो पार्टी सरकार चला रही है वह इसे अपनी तरह से विपक्ष पर सदन में बाधा उत्पन्न करने का आरोप लगाती है वहीं दूसरी तरफ विपक्ष अपने कदमों को सही बताते हुए सदन को ही ठप करने में लगा रहता है. आज महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करवाने में संख्या बल होने के कारण लोकसभा में सरकार के लिए बहुत आसानी है पर महत्वपूर्ण मसलों पर उसे राज्यसभा में विपक्ष के साथ की आवश्यकता अभी तो पड़ती ही रहेगी तो इस परिस्थिति में आखिर सदन को किस तरह से सुचारू रूप से चलाया जाये यह एक गंभीर मुद्दा हो चुका है.
                          सत्ता पक्ष से किसी मुद्दे पर अपनी बात मनवाने या उसे दबाव में लाने के लिए बहुमत वाली सरकारों पर भी सदैव सही दबाव बनाया जाता रहा है तो इस बार यही दबाव लोकसभा में पूर्ण बहुमत वाली सरकार को राज्यसभा में झेलना पड़ रहा है. देश में अभी वह संस्कृति विकसित नहीं हो पायी है जिसके चलते सरकार और विपक्ष देश हित के मुद्दों में राजनीति को किनारे करने की तरफ बढ़ सकें. परिपक्व लोकतंत्र के लिए इस तरह की सोच बनाना आवश्यक होता है क्योंकि देश के अंदर जो कुछ भी किया जाना है उसके लिए संसद को पूरे अधिकार प्राप्त हैं तथा सरकार के संसदीय कार्य मंत्रालय को अपनी कुशलता से सदन के काम काज को चलाये रखने के लिए विपक्ष से तालमेल बिठाये रखने की ज़रुरत होती है. यदि सदन में महत्वपूर्ण विधेयक लटकते हैं तो वर्तमान में मोदी और पिछली मनमोहन सरकार में इस मामले में कोई अंतर नहीं दिखाई देने वाला है. चुनाव की दृष्टि से महत्वपूर्ण राज्यों को लेकर जिस तरह से सदन में खींचातानी होती रहती है यदि उससे पार पाया जा सके तो वह देश के लिए अच्छा ही होगा.
                        आम तौर पर छोटे और क्षेत्रीय दल अपने मंतव्यों को पूरा करने के लिए ही इस तरह से सदन को बाधित करने का काम किया करते हैं और इस बार जिस तरह से लोकसभा में सरकार मज़बूत है तो उसे भी अनावश्यक बातों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय सदन को प्राथमिकता के अनुसार चलाने के बारे में सोचना चाहिए. पिछली लोकसभा में जिस हद तक सदन को बाधित करने का काम लगातार किया जाता रहा और ठीक इसी तरह के गतिरोध कई बार सामने आये जिसमें केवल बयान देने को लेकर ही कई दिनों तक गतिरोध बना रहा तो उससे आज की लोकसभा ने कोई सबक नहीं सीखा है. सदन में विपक्ष के पास जो कुछ भी है उस अपनी शक्ति का उपयोग रचनात्मक तरीके से लोकतांत्रिक विरोध के रूप में सामने लाने की तरफ सोचना चाहिए पर आज किसी भी तरह से सरकारों को नीचा दिखाने की विपक्षी दलों की मानसिकता पर कुछ भी नहीं किया जा सकता है. विपक्ष में चाहे भाजपा रही हो या आज कांग्रेस सही का रवैय्या कमोबेश एक तरह का ही रहता है और अभी देश को इस राजनीति से छुटकारा मिलता भी नहीं दिखाई दे रहा है.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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