शादी के लिए धर्म परिवर्तन

                                                   देश में जारी धर्मांतरण और घर वापसी के विवादों के बीच जिस तरह से इलाहबाद हाई कोर्ट ने पांच हिन्दू लड़कियों के मुस्लिम लड़कों से केवल शादी करने के लिए इस्लाम को अपनाये जाने को पूरी तरह से गलत बताया है तथा इसके बारे में पवित्र कुरान शरीफ की सूरा २ आयात २२१ में कही गयी बातों के उल्लंघन की तरफ भी ध्यान आकृष्ट किया है वह समाज के लिए राहत भरी बात भी हो सकती है. कोर्ट ने इस फैसले में यह भी स्पष्ट किया है कि गैर इस्लामी लड़के या लड़की से शादी करने के बारे में स्पष्ट रूप से पवित्र कुरान में बताया गया है कि जब तक वह लड़की या लड़का इस्लाम में पूरी तरह से अपनी आस्था न व्यक्त कर दे तब तक उसके साथ अपने लड़के या लड़की की शादी नहीं करनी चाहिए. इसके बाद से वर्तमान में देश भर और विशेषकर यूपी में चल रही घर वापसी की मुहिम से जुड़े मामलों में भी राज्य सरकार को कानूनी बल मिल जाने की सम्भावना है. इस मामले में राज्य सरकार ने भी कोर्ट की इस बात से पूरी सहमति दिखाते हुए इन लड़कियों को किसी भी तरह की सुरक्षा देने से मना कर दिया है जिसके कारण ही अलग अलग ज़िलों में ये याचिकाएं दर्ज़ हुई थीं और उन्हें हाई कोर्ट के सामने लाया गया था.
                                 अभी तक जिस तरह से दूसरी शादी करने के लिए हिन्दुओं में भी इस्लाम को अपनाये जाने की घटनाएँ होती रही हैं उन पर भी इस बारे में क्या असर पड़ेगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा क्योंकि फिल्म अभिनेता धर्मेन्द्र ने भी दूसरी शादी करने के लिए इस्लाम में आस्था दिखाई थी पर उसके बाद वे और उनकी पत्नी वर्तमान में भाजपा सांसद हेमा मालिनी इस्लाम को अपने जीवन में किस हद तक अपना रहे हैं यह सभी को पता है तो क्या उनके विरुद्ध ही कानूनी कार्यवाही का मामला नहीं बन सकता है ? धर्म का इस तरह से दुरूपयोग किया जाना किसी भी तरह से सही नहीं कहा जा सकता है क्योंकि यह स्वयं इस्लाम के सिद्धांतों के विरुद्ध है पर साथ ही बिना ईमान लाए केवल शादी करने के लिए इस्लाम को अपनाने वाले गैर इस्लामी लड़के और लड़कियों की शादी को भी इस्लाम की रौशनी में कहीं से भी जायज़ नहीं ठहराया जा सकता है. कोर्ट ने इस तरह से आस्था के मामले में स्वार्थ के लिए किये जाने वाले शादी जैसे काम को पूरी तरह से अवैध ही बताया है और इसके खिलाफ अपना फैसला भी दिया है.
                               इस याचिका में सभी लड़कियों ने दिए गए शपथ पत्र में कहीं भी यह नहीं कहा कि उनकी इस्लाम में गहरी आस्था है और वे इस कारण से धर्म परिवर्तन करना चाहती हैं बल्कि सभी द्वारा केवल यही कहा गया था कि उन्होंने केवल शादी करने के लिए ही इस्लाम क़ुबूल किया है. कोर्ट ने इन लड़कियों के इस तरह के बयान देने के बाद ही सन २००० में लिली थॉमस मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का भी उद्धरण दिया जिसके बाद इस्लाम और पवित्र कुरान के निर्देशों के अनुसार ये सारी शादियां ही अवैध हो जाती हैं. मनुष्य का सदैव यही प्रयास रहता है कि वह अपने स्वार्थ के लिए किसी भी संस्था, कानून और धर्म आदि से भी खिलवाड़ करने से नहीं चूकता है इसलिए अब आने वाले समय में इस तरह के मामलों में राज्य सरकार और कोर्ट के लिए भी थोड़ा और सचेत होने की आवश्यकता है क्योंकि केवल शादी करने के लिए ही इस तरह के मामले हमेशा ही सामने आते रहेगें और धर्म का इसी तरह से दुरूपयोग भी किया जाता रहेगा. व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए किसी भी धर्म के इस तरह के दुरपयोग को रोकने के लिए भी समाज को आगे आना पड़ेगा क्योंकि सरकारें और नेता अपने वोटबैंकों के अनुसार ही इस तरह के निर्णय लेने में विश्वास किया करते हैं.      
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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