प्रीमियम तत्काल और लोकलेखा समिति

                                                                गनीमत है कि संसद की लोकलेखा समिति की नज़र रेलवे की उस नयी व्यवस्था पर पड़ गयी है जिसके माध्यम से सरकार और रेलवे आम यात्रियों की खुलेआम जेब काटते हुए समस्याएं खडी करने में लगे हुए हैं. एक समय तत्काल कोटे की व्यवस्था रेलवे द्वारा सिर्फ इसलिए की गयी थी कि जिन यात्रियों को अचानक ही यात्रा का कार्यक्रम बनाना पड़ता है वे इस सुविधा का लाभ उठा सकें पर इस वर्ष अक्टूबर से रेलवे ने जिस तरह से इस तत्काल को भी कमाई का जरिया बनाने की तरफ कोशिशें शुरू कर दी हैं उससे कहीं भी रेलवे उस सामाजिक ज़िम्मेदारी पर खरी नहीं उतर सकती है जिसके लिए वह जानी जाती है. अब इस मामले को सही तरीके से ठीक किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि रेलवे के इस कदम को केवल यात्रियों की जेब से अधिक पैसा निकलने की जुगत से अधिक कुछ भी नहीं कहा जा सकता है और अब इससे निपटने और तत्काल को वापस पुराने स्वरुप में लाने की ज़रुरत भी सामने दिखाई देने लगी है.
                                    यह सही है कि रेलवे को अपनी परिचालन लागत को सुधारने की हर संभव कोशिश करने की आवश्यकता है और पिछले कुछ वर्षों से रेलवे बोर्ड की सोच में आये परिवर्तन के कारण ही आज मंडल स्तर पर भी नए प्रयोग शुरू किये जा रहे हैं और उनके अच्छे परिणामों से उसे दूसरे स्थानों पर भी लागू करने की तरफ भी सोचना शुरू किया जा रहा है. आज जब डीज़ल के दाम अपने कई वर्षों पुराने स्तर पर पहुँच गए हैं तो रेलवे का परिचालन घाटा अपने आप ही चालू वित्तीय वर्ष में कम होने की तरफ बढ़ना शुरू हो चूका है तो इस तरह की अनुकूल परिस्थिति में अब रेलवे का यात्रियों के साथ इस तरह का व्यवहार किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता है. हालाँकि यह काम पूर्व रेल मंत्री सदानंद गौड़ा के समय में हुआ था पर सुरेश प्रभु के रेल मंत्री बनने के बाद भी इस आदेश पर पुनर्विचार नहीं किया गया है जिससे आम यात्रियों के लिए समस्या वहीं पर टिकी हुई है पर सरकार ने इस बारे में कुछ भी करने की तरफ बढ़ने का कोई भी संकेत भी नहीं दिया है.
                                   आज रेलवे में जिस तरह के परिवर्तन किये जा रहे हैं वे आज के समय के अनुसार बिलकुल सही हैं पर इन कोशिशों के साथ रेलवे के उस स्वरुप को बनाये रखने के बारे में भी सोचा जाना चाहिए जो उसे आज देश भर में मिला हुआ है. जिन जगहों पर रेलवे का तंत्र है वहां के लोगों की ज़िंदगी इससे किस कदर जुडी हुई है यह सभी को पता है तो आम ज़िंदगी के एक हिस्से को केवल व्यापारिक दृष्टि से भी सरकार द्वारा नहीं चलाया जा सकता है. देश के दूर दराज़ के क्षेत्रों में जहाँ आज भी सवारी गाड़ियों में आमतौर पर ४ से ६ डिब्बे ही लगाये जा रहे हैं और यात्री छतों पर यात्रा करने को मज़बूर हैं तो इस स्थिति को सुधारने के लिए लम्बी दूरी की गाड़ियों के पुराने डिब्बों को अविलम्ब इनमें जोड़कर भी रेलवे की तरफ से इन क्षेत्रों को सुविधा प्रदान की जा सकती है. देश की आबादी के अनुसार डिब्बों की व्यवस्था न होने के कारण आज भी रेलवे कि आमदनी पर असर पड़ता है पर इस तरफ रेलवे का ध्यान ही नहीं जाता है और इन गाड़ियों का स्वरुप आज भी वही बना हुआ है जो अंग्रेज़ों के समय में शुरू किया गया था. आशा है कि सदन में इस रिपोर्ट के आने के बाद अब रेलवे इस कदम को वापस लेगी और आने वाले समय में ऐसे जनविरोधी फैसलों से खुद को दूर रखेगी.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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