आज के दौर में भारत रूस संबंध

                                                         आज़ादी के बाद से ही भारत सरकार के रूस की तरफ एक तरफ़ा झुकाव के चलते जिस तरह से दोनों देशों के बीच नज़दीकियां बनी रहीं वे कमोबेश आज भी जारी ही हैं पर आज के परिदृश्य में जब अमेरिका की तरफ अधिक झुकी रहने वाली भाजपा की सरकार भारत में है तो रूस के लिए अपने पुराने सहयोगी भारत में पैर जमाये रखने के लिए अधिक प्रयास करने पड़ रहे हैं. आज तक जिस तरह से दोनों देशों ने द्विपक्षीय मामलों में एक दुसरे के हितों को ही प्राथमिकता दी है और पूरी दुनिया से उसी तरह के सम्बन्ध बनने में अलग रुख अपनाया है आज वे पुराने सम्बन्ध भी कसौटी पर हैं. आज के भारत का भाजपा समर्थकों की लॉबिंग के चलते पश्चिमी देशों की तरफ अधिक झुकना रूस को अच्छा नहीं लग रहा है इस बात के संकेत रूस द्वारा पाक को उन हथियारों की सप्लाई खोलने से ही मिलता है जो आज तक उसने पाक की लाखों कोशिशों के बाद भी नहीं बेचे थे जबकि उसके पास अपने आर्थिक संकट से निपटने के लिए हथियारों की बिक्री का पाक एक बड़ा बाज़ार सदैव ही दिखाई देता है.
                                                     कहने के लिए तो यह वार्षिक शिखर बैठक ही है जिसे २००० में खुद पुतिन ने वाजपई के समय शुरू करवाया था पर इसका जो भी मक़सद था उसमें पुतिन कुछ हद तक सफल ही हुए हैं. भारत के साथ रक्षा, परमाणु और गैस-तेल उत्खनन की दिशा में आज भी इस बैठक के माध्यम से बहुत कुछ पाया जा सकता है पर इस बार की शिखर बैठक पर अमेरिका की भी नज़रें टिकी हुई हैं क्योंकि अगले माह ही ओबामा भी भारत की यात्रा पर आ रहे हैं. सरकारी सूत्रों की तरह से जिस तरह के संकेत मिल रहे हैं उससे यही लगता है कि लगभग १५ लंबित और महत्वपूर्ण मुद्दों पर तो समझौते किये ही जा सकते हैं और यदि पुतिन ने कुछ नरमी दिखाई तथा भारत की तरफ से मोदी ने पहल की तो बहुत सारे ऐसे मामलों पर भी चर्चा हो सकती है जिनको एजेंडे में शामिल नहीं किया गया है. पुतिन मोदी के नेतृत्व में चल रहे भारत से पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हैं जिससे ही उन्होंने ब्रिक्स के समय भी भारतीय पीएम को बैठक के लिए इंतज़ार करवा दिया था जो कि ऐसा मामला था जो दोनों देशों के बीच में कभी भी नहीं दिखाई देता था.
                                                  निश्चित तौर पर भारत और मोदी को भी उसी तरह अपने स्वाभिमान को बचाए रखने के अधिकार हैं जैसे रूस को हैं पर आज जिस तरह से रूस के साथ खरे उतरे संबंधों की जगह नए संबंधों को तरजीह दी जा रही है वह कहीं न कहीं से दोनों देशों के बीच के खिंचाव को भी दर्शाती है. यदि इस बार की शिखर बैठक में रूस को अपेक्षित परिणाम नहीं मिले तो इस बात की भी संभावनाएं हैं कि रूस इसे मात्र औपचारिकता मान कर अगले वर्ष से इस बैठक को करवाने में ही रूचि न दिखाए. आज यदि भारत सशक्त है तो हमें यह भी याद रखना होगा कि जब पूरी दुनिया अमेरिकी दबाव में भारत को किसी भी तरह से कोई स्थान नहीं देती थी तब रूस ने हमारे लिए हर स्तर पर सहयोग के मार्ग दिल से खोल रखे थे. हमारे यहाँ पर रूसी विमानों के दुर्घटनाग्रस्त होने से बहुत नुकसान होता है जो कि चिंता का कारण है पर रूस का कहना है कि घटिया पुर्ज़े खरीदे जाने के कारण ही यह दुर्घटनाएं होती हैं अब इस आरोप प्रत्यारोप से बाहर आकर वास्तविक समस्या पर ध्यान देते हुए भारत को आज अपने पुराने मित्र का मान रखने की पूरी कोशिश करनी चाहिए क्योंकि पुतिन इस तरह के किसी भी प्रयास के लिए द्विपक्षीय स्तर पर भारत को आज भी बहुत कुछ देने की स्थिति में हैं.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

About Dr Ashutosh Shukla

Only simple.....
यह प्रविष्टि अधिकार, अभिव्यक्ति, उद्योग, उपयोग, कर्तव्य, रक्षा, राजनीति, सरकार, सहायता में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s