असुरक्षित रेलवे क्रासिंग

                                                                           यूपी के मऊ जिले के महासों में जिस तरह से एक बार फिर से एक स्कूली बस ट्रेन की चपेट में आ गयी उसके बाद फिर से मानवरहित क्रासिंग पर आम लोगों की सुरक्षा सम्बन्धी चिंताओं की तरफ देश का ध्यान गया है. आज भी देश में हज़ारों ऐसी मानव रहित क्रासिंग हैं जिन पर सड़क मार्ग से चलने वालों की ज़रा सी भी लापरवाही बहुत बड़ा संकट लेकर सामने आ जाती है. इस तरह की परिस्थितियों से निपटने के लिए जहाँ रेलवे के पास सीमित संसाधन ही हैं वहीं आम लोगों में जागरूकता की कमी और जल्दी करने की आदत भी अधिकांश मामलों में जानलेवा साबित हो जाती है. इस मामले में एक पक्ष यह भी सामने आ रहा है कि घने कोहरे के साथ वैन के चालक ने अपने कानों में हेडसेट भी लगा रखा था जिससे उसे ट्रेन की आवाज़ भी सुनाई नहीं दी थी और यह दुर्घटना हो गयी थी. आज मोबाइल और उसके द्वारा संचालित होने वाली अन्य सुविधाओं के चलते सड़क मार्ग किसी तरह से असुरक्षित होते जा रहे हैं यह इसका ही एक और उदाहरण है.
                                हर बार इस तरह की दुर्घटना होने पर सभी रेलवे को ही ज़िम्मेदार ठहराते हैं क्योंकि उसके मानव रहित फाटक आज भी अस्तित्व में है पर कोई इस बात पर कभी भी ध्यान नहीं देना चाहता है कि सड़क पर चलने वाले किस तरह से खलेआम इन फाटकों के लिए निर्धारित नियमों का उल्लंघन किया करते हैं ? आज भी देश में हज़ारों ऐसी जगहें हैं जहाँ पर आम लोग अपने अनुसार ट्रेन के यातायात को देखकर आगे बढ़ते हैं और सुरक्षित रूप से अपने गंतव्य तक पहुँचते हैं पर कुछ मामलों में नियमों की साधारण सी अनदेखी ही अधिकांश मामलों में इस तरह की दुर्घटना का कारण बनती है. आम लोग इस मामले में जिस तरह से मानव रहित फाटकों को ही दोषी मानते हैं वहीं वे यह भूल जाते हैं कि जहाँ पर फाटक लगे हुए हैं वहां पर भी वे ट्रेन को आता देखकर उसके सामने से निकलने की अपनी आदत में कौन सा बदलाव कर लेते हैं ? केवल सरकार और रेलवे को ज़िम्मेदार ठहराने से परिस्थितियां सुधरने वाली नहीं हैं और इस मामले में जन जागरूकता को बढ़ाये जाने की ज़रुरत है.
                                इन दुर्घटनाओं से रेलवे को होने वाले नुक्सान, मुआवज़े और फाटक लगाने के खर्चे के बारे में जिस तरह से लोग राय देना शुरू कर देते हैं उनकी क्या वास्तविकता है यह कोई भी नहीं समझ सकता है. दूर दराज़ के क्षेत्रों में जहाँ पर कानून व्यवस्था में कमज़ोरी ही रहा करती है यदि ऐसे फाटक लगा दिए गए तो स्थानीय कारकों के साथ काम करने वाले अपराधियों के लिए सड़क मार्ग से चलने वाले लोगों को लूटना और भी आसान हो जाने वाला है क्योंकि फाटक पर रहने वाले रेलवे कर्मचारी से कोई भी जबरिया उसे बंद करने के लिए कह सकता है और आने जाने वाले वाहनों से लूटपाट भी कर सकता है. जब भी रेलवे के पास इस दिशा में संसाधन उपलब्ध हों तो उसे सभी जगहों पर फाटक लगाने के बारे में अवश्य ही सोचना चाहिए पर बिना अधिक रेल ट्रैफिक वाले क्षेत्रों में इन फाटकों को लगाये जाने का कोई औचित्य भी नहीं है. जिन स्थानों पर दिन भर में कुछ ट्रेनें ही गुज़रती हैं वहां पर रेलवे के संसाधनों को अनावश्यक रूप से खर्च करने के स्थान पर लोगों को नियमित तौर पर जागरूक किये जाने की अधिक आवश्यकता है जिससे रेलवे पर आर्थिक बोझ भी न पड़े और आम लोग सुरक्षित भी रह सकें.      
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

About Dr Ashutosh Shukla

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