रोहतक छेड़छाड़- समाज और पंचायत

                                                                              रोहतक में एक बस में हुई छेड़छाड़ और उसके बाद लड़कियों द्वारा किये गए तीव्र प्रतिरोध के बाद जिस तरह से कानून को ताक पर रखने की कोशिशें शुरू की जा चुकी हैं उनका कोई मतलब नहीं बनता है. आम तौर पर किसी जगह इस तरह की घटना होने पर जन सामान्य इसमें उलझना नहीं चाहता है तथा कुल मिलकर लड़कियों को ही समझाने के प्रयास शुरू कर दिए जाते हैं उससे समाज में लड़कों के गलत बर्ताव के प्रति भी सहानुभूति रखने की मानसिकता का ही पता चलता है. अभी तक जिस तरह से इन लड़कियों ने अपने दम पर इन लड़कों से निपटने की कोशिश की थी अगर उसका विडिओ न बन जाता तो मामला सबके सामने नहीं आने पाता और लड़कों को बचाने में लगा हुआ समाज इस बात को आसानी से छिपा भी ले जाता पर इन लड़कियों के साथ ही इन अन्य महिला को छेड़ने के कारण उसने लड़कियों की हिम्मत भरी कोशिश को अपने मोबाइल में रिकॉर्ड कर लिया जिससे मामला खुल गया और लड़कों की पहचान भी हो सकी.
                                                  इस घटना में आरोपियों की पहचान सामने आने के बाद जिस तरह से पंचायत का दखल इसमें बढ़ता ही जा रहा है और समाज के कमज़ोर वर्ग से आने वाली लड़कियों पर सामाजिक दबाव बनाया जा रहा है उसके बाद पुलिस का इसमें कितना रोल बचता है यह तो समय आने पर ही पता चल पायेगा पर महिलाओं पर पाबन्दी लगाने वाले समाज ने एक बार फिर से यह साबित कर ही दिया है कि उसके लिए आज भी जातीय बंधन उतने ही महत्वपूर्ण हैं. यदि मामला यहाँ पर उल्टा होता और लड़के समाज के कमज़ोर वर्ग के होते तथा लड़कियां उच्च वर्ग से होतीं तब भी क्या पंचायत इस तरह से ही अपने फैसले लेने की कोशिश कर पाती ? शायद नहीं क्योंकि तब उन्हें यह उनकी इज़्ज़त से जुड़ा हुआ मसला लगने लगता जिसमें शामिल लोगों को हर स्तर पर सजा दिलवाने की हर संभव कोशिश भी की जाती. समाज के इस दोहरे चरित्र के चलते ही आज इस तरह की घटनाओं के बारे में कोई कठोर कार्यवाही कर पाने में पूरा समाज ही फेल ही जाता है.
                                                            इन अभद्र लड़कों के परिवार वाले अब जिस तरह से लड़की के पिता पर दबाव बना रहे हैं तो क्या उन्हें पहले अपने लड़कों के व्यवहार के लिए खुद को ज़िम्मेदार नहीं मानना चाहिए ? एक सूचना के अनुसार को इन लड़कों का सेना में चयन हो चुका है और जल्दी ही ये वहां पर ज्वाइन भी करने वाले हैं और यदि इन पर यह आरोप लगा तो सेना में इनकी नियुक्ति पर भी ग्रहण लग जायेगा सिर्फ इस बात को लेकर ही अब जिस तरह का दबाव बनाया जा रहा है क्या उससे इन या इस तरह की मानसिकता वाले लड़कों को सुधारा जा सकता है ? आज देश के लिए जीने मरने की कसमें खाने को तैयार होने की कगार पर खड़े इस तरह की मानसिकता वाले लड़के यदि सेना में पहुँच जाते हैं तो इनके द्वारा अपनी पोस्टिंग के दौरान कहीं न कहीं सेना को भी शर्मिंदगी उठानी पड़ सकती है. सेना के लिए जिस अनुशासन की आवश्यकता होती है उसके पहले मानदंड में तो यह लड़के पूरी तरह से असफल ही हो चुके हैं अब लड़की के परिवार वाले भले ही इन्हें माफ़ कर दें पर सेना को इनके चयन को निरस्त किये जाने के बारे में स्पष्ट रूप से घोषणा कर ही देनी चाहिए.        
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

About Dr Ashutosh Shukla

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यह प्रविष्टि अपराध, अराजकता, कर्तव्य, न्याय, पंचायत, पुलिस, समाज, सरकार में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

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