एलपीजी सब्सिडी

                                                             वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जिस तरह से सरकार के खर्चे और सब्सिडी का बोझ काम करने की दिशा में निर्धारित मानदंडों का अनुपालन करने की तरफ बढ़ने की बात कही है वह अब देश के लिए एक आवश्यकता है क्योंकि अभी तक सब्सिडी केवल राजनीति का ही विषय रही है जबकि इसे आर्थिक विषय माना जाना चाहिए. आज़ादी के बाद जिस तरह से देश में गरीबी का बोलबाला था तो सरकार ने बहुत सारी चीज़ों पर नियंत्रण रखा हुआ था पर समय के साथ उसकी आवश्यकता समाप्त होने लगी तो उसे ख़त्म करने की दिशा में काम करना शुरू कर दिया गया. १९९१ से शुरू हुए आर्थिक सुधारों के बाद देश में आम माध्यम और निम्न वर्ग की आय में सही अनुपात में वृद्धि भी हुई है जिसके कारण ही आज देश पूरी दुनिया के सामने एक बड़ा बाज़ार बनकर खड़ा हो चुका है. ऐसी स्थिति में वित्त मंत्री का यह कहना कि अब देश में इस तरह की आर्थिक बोझ वाली सुविधाएँ समाप्त की जायेंगीं अपने आप में सही कदम हो सकता है और इसको एक झटके में समाप्त करने के स्थान पर चरणबद्ध तरीके से ही विभिन्न स्तरों में लागू किया जाना चाहिए.
                                         इस कदम की शुरुवात सबसे पहले सांसद और विधायकों के साथ शुरू की जानी चाहिए और पूरे देश में एक आदेश जारी कर सभी सांसदों और राज्यों के विधायकों से इस सब्सिडी को वापस लेने के बारे में सोचा जाना चाहिए. इसके बाद केंद्र सरकार के प्रथम और उसके बाद के सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों को इसमें शामिल किया जाना चाहिए जिससे आने समय में इसका कुछ ठोस स्वरुप सामने आ सके. सरकार को एक निश्चित आयकर सीमा के बाद सभी के लिए यह सब्सिडी समाप्त कर देनी चाहिए और आयकर देने वाले लोगों के पैन नंबर से इसका ऑनलाइन सत्यापन करवाना चाहिए जिससे आने वाले समय में कोई भी इसका दुरूपयोग न कर सके. किस आयकर सीमा में आने वाले लोगों को इससे मुक्त करना है यह पूरी तरह से स्पष्ट होना चाहिए. बिना सही और प्रभावी नियम बनाये केवल कह देने से नीतियों का अनुपालन नहीं किया जा सकता है क्योंकि आम भारतीय इस सब बातों से सहमत तो होता है पर धरातल पर कुछ करने के लिए आगे नहीं आना चाहता है. 
                                          आज देश को कड़े आर्थिक कदम उठाने की ज़रुरत है और इसके लिए शुरुवात नेताओं को अपने से ही करनी चाहिए तथा सबसे पहले संसद में मिलने वाले सस्ते खाने को बाज़ार के रेट पर किया जाना चाहिए क्योंकि आईआरसीटीसी के माध्यम से रेलवे को घाटा करवाने से सरकार किस तरह के आर्थिक सुधार लागू करना चाहती है यह भी सामने आना चाहिए. वित्तीय अनुशासन केवल कहने भर का ही न हो बल्कि उसका वास्तविक प्रभाव भी दिखाई देना चाहिए. आज सबसे बड़ी आवश्यकता प्राथमिकता के आधार पर गैस वितरकों को ऑनलाइन करने की होनी चाहिए और उन पर इस बात का दबाव भी समय सीमा के साथ होना चाहिए कि वे सभी मूलभूत ढांचों को कितने समय में पूरा कर लेंगें. आज भी देश के बड़े शहरों को छोड़कर सभी वितरक पुराने ढर्रे पर ही चल रहे हैं जिससे नेटवर्क को अभी भी सुधारा नहीं जा सका है. अच्छा हो कि सरकार इस तरह के कार्यों के लिए एक अलग निगरानी व्यवस्था कर उसके पूरा होने तक एक राज्यमंत्री की नियुक्ति भी कर दे जो इससे जुडी समस्याओं को सलझाने में पीएमओ और वित्त मंत्रालय से उचित निर्देश प्राप्त कर समन्वय स्थापित कर सके.       
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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