सुधार की रेल

                                                       पिछले तीन दशकों में देश में मज़बूत सरकारें न बन पाने और सहयोगी दलों द्वारा महत्वपूर्ण रेल मंत्रालय को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़े जाने के कारण ही देश में रेल के विकास की जो भी संभावनाएं बन सकती थीं वे रास्ते में दम तोड़ गयीं. इन महत्वपूर्ण वर्षों में जिस तरह से रेल बिहार और बंगाल के नेताओं के तहत ही रही उससे भी देश को कोई विशेष सामाजिक और रेलवे को व्यावसायिक लाभ नहीं हुआ पर इस बार मोदी की मज़बूत सरकार बनने के बाद भी गौड़ा जैसे कम अनुभवी नेता को विभाग सौंप कर जो गलती की गयी थी उसे बहुत ही समय रहते सुधार लिया गया है और सुरेश प्रभु के पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए उनसे ठोस पहल की उम्मीद भी लगायी जा सकती है. भारतीय रेल की वास्तविक आवश्यकताएं अधिकांश समय विभाग चला रहे मंत्रियों की ज़रूरतों को पूरा करने में ही लग जाती हैं जिससे विभाग की सोच भी आगे नहीं बढ़ पाती है पर अब इससे आगे बढ़ने की आवश्यकता है क्योंकि पीएम के ड्रीम प्रोजेक्ट्स में रेल भी शामिल है.
                                                        यात्री सेगमेंट में प्रभु का यह सुझाव स्वागत योग्य है कि १० घण्टे में अपना सफर तय करने वाली ट्रेनों में स्लीपर क्लास को पूरी तरह से सीटिंग क्लास से बदल दिया जाये क्योंकि इससे पूरी ट्रेन में लगने वाले डिब्बों की संख्या को वर्तमान स्थिति में रखते हुए यात्रियों की क्षमता में प्रति डिब्बे २८ की वृद्धि की जा सकती है और रेलवे को भी लगभग २००० रूपये प्रति कोच का लाभ हो सकता है तो इस स्थिति में यदि पूरी ट्रेन के १० से बारह डिब्बों को बदला जा सके तो उसी अनुपात में रेलवे का यात्री ईंधन खर्च काफी नियंत्रण में आ सकता है. रेलवे को अपने वर्तमान ढांचे को सुधारने के लिए सतत प्रयासों की आवश्यकता है इसलिए आधारभूत संरचनाओं के विकास के लिए एक बार शुरू की गयी परियोजनाओं को पूरा होने तक धन आवंटन में कमी से बचाने और नयी योजनाएं लागू करने के बारे में नीतिगत निर्णय लेने की आावश्यकता भी है.
                                                यदि संभव हो तो रेलवे को इस तरह के किसी भी प्रयोग को शुरू करने से पहले देश के किसी हिस्से में केवल इस तरह के कोच बनाने वाली डेडिकेटेड रेल कोच फैक्ट्री स्थापित करने के बारे में गंभीरता से सोचना होगा क्योंकि वर्तमान रेल कोच फैक्टरियों से वर्तमान ज़रुरत ही पूरी नहीं हो पा रही है. पहली बात तो रेलवे के पास अभी इस तरह के कोच उपलब्ध नहीं है इसलिए कोई भी प्रयोग बड़े स्तर पर संभव ही नहीं है इसलिए जिन ट्रेनों में सुरक्षा की दृष्टि से अभी २८ डिब्बों की सीमा तक नहीं पहुंचा गया है सबसे पहले उनको उस क्षमता तक पहुँचाने के बारे में सोचा जाना चाहिए. कोच उपलब्ध होने पर उन्हें रेल मंत्री के सुझाव के अनुसार ट्रेनों में जोड़ने का काम भी शुरू किया जाना चाहिए. वर्तमान में चल रही ट्रेनों के स्वरुप में बड़े परिवर्तनों से आम लोगों को ही परेशानी होने वाली है इसलिए यदि तकनीकी और सुरक्षा के अनुसार संभव हो तो हर ट्रेन में एक-दो डबल डेकर कुर्सी यान लगाने के बारे में सोचा जाने चाहिए. फिलहाल मज़बूत सरकार के संकल्पित मंत्री कुछ करने में सक्षम हैं इसलिए उन्हें अपने विचारों को प्रायोगिक तौर पर शुरू करने के आदेश देने चाहिए.         
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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