छत्तीसगढ़ और परिवार नियोजन

                                                                     छत्तीसगढ़ में नलबंदी ऑपरेशन के बाद महिलाओं को दी गयी दवा में चूहेमार दवा के मिश्रण के पाये जाने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि रमन सरकार इस मामले से जिस तरह से निपटने का प्रयास कर रही यही वह केवल लीपापोती की श्रेणी में ही आता है क्योंकि इस पूरे मामले में ऑपरेशन में कोई कमी नहीं पायी गयीं है और सारी खामी दवा में विषैले रसायन के कारण ही दिखाई दे रही है. आज जिस तरह से छत्तीसगढ़ सरकार पूरे देश के साथ दुनिया की नज़रों में है उससे यही पता चलता है कि वहां कुछ न कुछ ऐसा अवश्य ही चल रहा था जिसकी भनक सरकार को भी थी शायद इसी कारण सीएम ने बिना किसी जांच के पूरा हुए ही अपने स्वास्थ्य मंत्री को क्लीन चिट दे दी थी और पूरे मामले में निर्दोष डॉक्टर को सजा दी जिसमें उसका कोई दोष ही नहीं था ? अब अपने कथित सु-शासन को बचाये रखने के लिए रमन सरकार ने जो किया वह कहीं से भी स्वीकार नहीं किया जा सकता है.
                                    सरकार को अब अपनी गलती सुधारते हुए निलंबित किये हुए डॉ को तत्काल बहाल करना चाहिए और उनसे इस बात के लिए माफ़ी भी मांगनी चाहिए क्योंकि सरकार के मनमाने रुख से उनकी प्रतिष्ठा को धक्का लगा है और उनकी मानहानि भी हुई है. जिस बेशर्मी से आज भी सरकार को अपनी कमी नहीं दिखाई दे रही है उससे तो यही लगता है कि छत्तीसगढ़ में मज़बूत विपक्ष के न होने का खामियाज़ा पता नहीं और किस किस तरह से जनता भुगत रही है ? नक्सली हमले में यदि कांग्रेस की राज्य इकाई के बड़े नेताओं की हत्या न हुई होती तो संभवतः पिछले वर्ष के चुनावों में नतीजा कुछ और ही आ सकता था. किसी भी गलती को सुधारने का कोई समय नहीं होता है यदि रमन सिंह में नैतिकता बची है तो उन्हें निलंबित डॉ को तुरंत बहाल करते हुए पूरे मामले की सीबीआई द्वारा जांच करने चाहिए क्योंकि अत्यधिक बजट होने के कारण कहीं इसमें भी यूपी के स्वास्थ्य विभाग घोटाले की तरह कोई बड़े नाम सामने आ सकते हैं.
                                    इस पूरे मामले में एक बात और भी सामने आई है कि जिन महिलाओं की नलबंदी की जा रही थी उनकी बैगा जनजाति को परिवार नियोजन के कार्यक्रम से मुक्त रखा गया है तो इस मामले में सरकार यहाँ पर भी दोषी पायी जाती है. बैगा जनजाति के अस्तित्व पर आसन्न खतरे को देखते हुए उनको परिवार नियोजन के कार्यक्रम से मुक्त रखा गया है और किस आदेश के द्वारा इन लोगों के माध्यम से सरकार अपने आंकड़े सुधारने में लगी हुई थी यह भी चिंताजनक है. एक मामले के खुलने में जिस तरह से पूरी छत्तीसगढ़ सरकार ही कटघरे में खड़ी दिखाई देने लगी है और अपनी गलती को सरकार के मुखिया और अन्य नेता जिस बेशर्मी से डॉक्टरों पर डालने में लगे हुए हैं उससे उसकी कार्यशैली का ही पता चलता है. अच्छा हो कि केवल आंकड़ों के स्थान पर मानवीयता को देश के हर राज्य में प्राथमिकता दी जाये और सरकारी कार्यक्रमों को जनता से वास्तविक रूप से जोड़ने के प्रयास शुरू किये जाएँ जिससे इनके सही परिणाम सामने आ सकें.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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