कांग्रेस, नेहरू और सेमिनार

                                                                        देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की कांग्रेस पार्टी द्वारा १२५वीं जयंती मनाये जाने को लेकर जिस तरह का विवाद मीडिया में शुरू हुआ है उससे बचा जा सकता था. इस तरह का आयोजन में नेहरू की भूमिका और उनके दुनिया पर पड़े प्रभाव को लेकर जिस तरह से काफी कुछ कहा और सुना जा सकता है यदि उसमें पूरे देश के सुर भी सम्मिलित हो जाते तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर के इस सेमिनार में चार चाँद भी लग सकते थे पर पार्टी गत राजनीति जिसकी शुरुवात पीएम की तरफ से की गयी है कांग्रेस ने उसे आगे बढ़ाते हुए सारे मामले को और भी बिगाड़ने का काम किया है. वैसे देखा जाये किसी पार्टी द्वारा इस तरह के कार्यक्रम में दूसरे दलों के नेताओं को भी बुलाये जाने की परंपरा अभी तक देश में नहीं शुरू हो पायी है क्योंकि हर पार्टी को यह लगता है कि उनके कार्यक्रम में आने वाले विरोधी दलों के नेताओं से उनके कार्यक्रम पर असर पड़ सकता है.
                                                             अपनी सुविधा के अनुसार पूर्व प्रधानमंत्रियों के बारे में कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना किसी भी तरह से सही नहीं कहा जा सकता है केंद्र सरकार को यह पूरा अधिकार है कि वह अपने स्तर से किसके कार्यक्रमों को मनाये और किसके कार्यक्रमों की अनदेखी करे पर जो लोग कभी राष्ट्र को चलने में अपना योगदान देकर अब इस दुनिया में नहीं हैं उनके प्रति इस तरह की संकुचित सोच रखने का आखिर क्या उद्देश्य हो सकता था ? पूर्व प्रधानमंत्रियों की जयंती और पुण्यतिथि को सरकारी खर्चे बचाने की कवायद से जोड़ा जाना हास्यास्पद ही अधिक लगता है क्योंकि आज जब देश लगभग हर क्षेत्र में आगे ही बढ़ता जा रहा है तो किफ़ायत के नाम पर इस तरह से कभी देश को चलाने वालों को जानबूझकर भुलाना किसी सही परिपाटी को जन्म नहीं दे सकता है. फिर भी आज देश में इस तरह की असहिष्णु राजनीति को पहले पायदान पर पहुंचाने का काम केंद्र सरकार द्वारा किया जा रहा है.
                                                        वैसे यदि देखा जाये तो नेहरू को भारत की हर समस्या की जड़ मानने वाले संघ परिवार और उसकी राजनैतिक इकाई भाजपा को इस तरह के किसी भी कार्यक्रम में न बुलाया जाना कांग्रेस के अनुसार सही ही है क्योंकि इन लोगों को नेहरू में केवल कमियां ही दिखाई देती रही हैं और अब जब मोदी अपने को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गुजरात के सीएम से इतर व्यापक सोच वाला नेता साबित करने की कोशिशों में लगे हुए हैं तो उस परिस्थिति में सरकार इन नेताओं को पूरी तरह से अनदेखी भी नहीं कर सकती है. सरकार ने खुद ही केवल गांधी जी से जुड़े कार्यक्रमों को मनाने का जो निर्णय लिया था उसके बाद यदि कांग्रेस नेहरू के नाम पर कुछ करती है तो इससे उसे या किसी अन्य को आपत्ति नहीं होनी चाहिए. ३१ अक्टूबर को मोदी ने जिस तरह से इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि की पूरी तरह से अनदेखी की उससे इस तरह की राजनीति का शुरू होना स्वाभाविक ही है पर इससे देश के नायकों के बारे में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मतभेद के जो सुर सुने जा सकते हैं संभवतः उनकी कोई आवश्यकता नहीं है.   
   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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