शिवसेना के विकल्प

                                                   हर बात पर अपनी ज़िद पर अड़े रहने के स्वाभाव से भरपूर शिवसेना के सामने आज के राजनैतिक माहौल में अपने अस्तित्व को बचाये रखने का संकट अधिक बलवती दिखाई दे रहा है. पिछले कुछ महीनों में उसकी तरफ से होने वाली रणनीतिक चूकों के कारण ही आज वह २५ वर्षों तक अपने ही सहयोगी रहे दल भाजपा से सशंकित नज़र आ रही है. यह उसकी विडंबना ही है कि आज जब केंद्र में मज़बूत बहुमत के साथ भाजपा की सरकार है तो उसे अपने सम्मान के बचाव के लिए उस तरह के रास्ते खोजने पड़ रहे हैं जैसे विरोधियों की सरकार होने पर भी नहीं खोजने पड़े थे. किसी भी दल के नेता चाहे कितनी भी बड़ी बड़ी बातें कर लें पर सत्ता का सुख उनसे दूर होते ही वे बेचैन होने लगते हैं और कहीं से भी सत्ता के दरवाज़े तक पहुँचने की कोई भी उम्मीद उन्हें अपनी निष्ठाएँ बदलने के लिए उकसा ही दिया करती है और वे नैतिकता को किनारे कर पाला बदल सत्ता के सुख भोगने लगते हैं.
                                                   आज यदि शिवसेना अनावश्यक रूप से भाजपा से टकराने की कोशिशें कर रही है तो उससे उसका भय ही सामने आ रहा है क्योंकि अब कहीं न कहीं से मोदी और भाजपा ने अपने पहले मंत्रिमंडल विस्तार से यह सन्देश देने में सफलता पा ली है कि सुरेश प्रभु की तरह शिवसेना के लोग यदि भाजपा के साथ आना चाहें या फिर वे अपने दल में टूट कर सरकार का समर्थन करना चाहें तो उसके लिए भी रास्ते खुले हुए हैं. अब दूसरों पर हमलावर रहने वाली शिवसेना के पास कोई ख़ास विकल्प शेष नहीं बचे हैं तथा आज भी हताशा में वह जिस तरह से बयानबाज़ी कर सरकार और भाजपा पर शर्तें और अल्टीमेटम की राजनीति के माध्यम से दबाव बनाने की कोशिशें कर रही है उसके सुखद परिणाम आने की संभावनाएं बहुत ही कम हैं. भाजपा के लिए नयी नयी शर्तें रखने के पीछे उसकी मंशा भी सिर्फ इतनी ही है कि उसके विधायक पार्टी छोड़ने के बारे में न सोचने लगें और उसके बचा हुआ जनाधार भी खिसकने लगे.
                                                   वैसे तो सुरेश प्रभु शालीनता के साथ राजनीति करने में ही विश्वास किया करते हैं पर आज जो स्थिति बन चुकी है तो मोदी और शाह की तरफ से शिवसेना के लिए यह एक चुनौती ही है कि वे अपने दल को बचा सकते हों तो बचा लें क्योंकि जिस तरह से महाराष्ट्र में विधान सभा अध्यक्ष के लिए चुनाव होने की संभावनाएं बन रही हैं तो देवेन्द्र सरकार के लिए कोई भी रणनीतिक चूक बहुत भारी हो सकती है. एनसीपी के सरकार के खिलाफ वोट होने की स्थिति में तो सदन से बाहर जाने का आश्वासन देवेन्द्र को मिला हुआ है पर अस्थिर विधानसभा में सर्वेसर्वा रहने वाले अध्यक्ष की कुर्सी का लोभ एनसीपी कब तक छोड़ पायेगी सारा मामला इस बात पर ही टिक गया है. शाह और मोदी कि तरफ से जिस तरह से शिवसेना के प्रति ठंडा रुख अपनाया जा रहा है उससे यही लगता है कि वे भी शिवसेना को सबक सिखाने के साथ उसे तोड़कर देवेन्द्र सरकार को स्थिर करने का मन बना चुके हैं पर उद्धव ठाकरे और शिवसेना को अभी भी यह बात समझ में नहीं आ रही है.      
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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