१९८४ के दंगे और राजनीति

                                                                             इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जिस तरह से दिल्ली और देश के अन्य स्थानों पर सिखों पर हमले किये गए उसमें देश की सबसे जीवंत कौम पर बहुत ही बुरा असर पड़ा था और आज तक विभिन्न राजनैतिक लाभ लेने के कारणों से इस मुद्दे पर राजनीति किये जाने की कोशिशें बंद नहीं हो पायी हैं. ताज़ा मामले में जिस तरह से इस वर्ष ३० अक्टूबर को ही मोदी सरकार की तरफ से यह कहा गया कि हर दंगा पीड़ित को पांच लाख रूपये दिए जायेंगें उसका व्यापक रूप से स्वागत ही किया गया था क्योंकि किसी की भी कमी को रुपयों से तो पूरा नहीं किया जा सकता है फिर भी यदि पीड़ित और प्रभावी परिवार को कुछ आर्थिक सहायता मिल जाये तो वे अपने समाप्त हुए कारोबार को दोबारा शुरू करने की फिर से कोशिश तो शुरू कर ही सकते हैं पर इस मामले में सब कुछ इतना लम्बा और उबाऊ हो चुका है कि किसी भी परिस्थिति में अब वह मरहम का काम नहीं कर सकता है.
                                                                  ३० अक्टूबर को सरकार द्वारा की गयी घोषणा में वैसे तो कोई कमी और बुराई तो नहीं थी पर जिस तरह से दिल्ली की तीन सीटों और जम्मू कश्मीर, झारखण्ड विधान सभाओं के चुनाव के चलते आचार संहिता लागू हो चुकी थी तो इस तरह की घोषणा करने का मतलब पूरी तरह से राजनैतिक ही था. सरकार की तरफ से इस तरह कि संकेत मिलने के बाद चुनाव आयोग ने स्पष्टीकरण मांग लिया तो गृह मंत्रालय की तरफ से यह कहा गया कि इस मामले में केवल विचार चल रहा है और किसी भी तरह की घोषणा या अधिसूचना जारी नहीं की गयी है. इस तरह के जवाब से कानूनी तौर पर तो सरकार का बचाव हो गया है पर उसकी मंशा भी साफ़ ज़ाहिर हो गयी है कि उसने केवल चुनावी लाभ लेने के लिए ही इस तरह कि घोषणा की है. चुनाव आयोग की सक्रियता और सरकार को गलत टाइमिंग के कारण सिखों की इस समस्या को एक बार फिर से राजनीति में घसीट लिया गया है.
                                                                कांग्रेस के लिए यह मुद्दा सदैव ही संवेदनशील रहा है क्योंकि उस समय से आज तक उसके नेताओं पर दंगें भड़काने और दंगाइयों का साथ देने के आरोप लगते रहे है और दुर्भाग्य की बात यह भी है कि सबूतों के अभाव में अधिकांश लोग बचते ही जा रहे हैं. इस तरह के मामलों में साफ़ मंशा के साथ काम करने की आवश्यकता होती है कांग्रेस की दुविधा और कमज़ोर इच्छा शक्ति के कारण आज तक इस पर कुछ ठोस नहीं हो पाया है. इस स्थिति को सुधारने के स्थान पर भाजपा ने भी इस मुद्दे पर राजनीति को ही हवा दी है जिसे उचित नहीं कहा जा सकता है. भारत सरकार इन पीड़ितों के लिए जो कुछ भी कर सकती है या फिर करने की इच्छा रखती है उसे यह सब बिना किसी राजनीति के एक मज़बूत नीति के माध्यम से उसे लागू कर मामले को अब ख़त्म करने की तरफ बढ़ाना चाहिए जिससे पीड़ितों के घावों को बार बार कुरेदे जाने से बचा जा सके और उनकी वास्तविक सहायता भी की जा सके.     
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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