आधार, एनपीआर और सरकार

                                                                देश के नागरिकों को एक महत्वपूर्ण और त्रुटिरहित पहचान उपलब्ध कराने के सम्बन्ध में संप्रग सरकार द्वारा शुरू की गयी “आधार” परियोजना में जिस तरह से शुरू से ही खींचतान मची रही है अब उस पर गृह मंत्रालय के ताज़ा रुख के बाद स्थिति स्पष्ट होने लगी है. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में भारत सरकार का यह मानना था कि देश के हर नागरिक की बायोमीट्रिक पहचान भी होनी चाहिए जिससे किसी भी स्थान पर होने के बाद भी उसके पास कोई वैध पहचान पत्र न होने के बाद भी इस आधार के माध्यम से उसकी पहचान साबित की जा सके. देश में हर व्यक्ति के पास इस तरह की पहचान होने से जहाँ सरकार को उन स्थानों पर आसानी होने की पूरी सम्भावना थी जहाँ गलत या सही पहचा कर पाने में असफल रहने पर उसकी योजनाओं का बड़े पैमाने पर दुरूपयोग किया जाता था और इसलिए ही सरकार ने बैंक खतों से लगाकर हर महत्वपूर्ण पहचान निर्धारित करने की प्रणाली से आधार को जोड़ने की कड़ी वकालत की थी.
                                                          उस समय भी गृह मंत्रालय में बैठे हुए अधिकारियों और मंत्रियों को लगता था कि इस तरह की पहचान उपलब्ध होने के बाद उसे नागरिकता के रूप में दुरूपयोग किया जा सकता है इसलिए पहले संप्रग के पी चिदंबरम फिर सुशील कुमार शिंदे के समय और पहले पांच महीने राजग के राजनाथ सिंह का भी गृह मंत्री के रूप में यही मानना रहा है कि यह संशय सही है पर पीएम के आधार की व्यापक उपयोगिता पर काम शुरू करने के निर्देश के बाद से ही परिस्थितियां बदलनी शुरू हो गयी हैं. पीएम के रूप में नरेंद्र मोदी को भी मनमोहन सिंह का वह विचार पूरी तरह से सही लगता है कि हर नागरिक के पास एक वैध पहचान होनी ही चाहिए और इस बारे में पहले से ही स्पष्ट किया जा चुका है कि आधार केवल एक वैध पहचान पत्र है नागरिकता के प्रमाण के रूप में इसे इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है तो यह रुख अब पूरी तरह से सही साबित हो रहा है क्योंकि भाजपा द्वारा भारतीय नागरिकों के साथ अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशियों के आधार में पंजीयन होने पर हल्ला मचाने के बाद ही गृह मंत्रालय ने इस पर आपत्तियां करनी शुरू कर दी थीं.
                                                          गृह मंत्रालय द्वारा इसके साथ ही राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के बनाये जाने की शुरुवात भी की गयी तो उसके बाद योजना आयोग और गृह मंत्रालय के बीच इस बात पर भी काफी दिनों तक ठनी रही कि यह पहचान जारी करने का अधिकार किसके पास होना चाहिए तो तत्कालीन सरकार ने दोनों एजेंसियों द्वारा इकठ्ठा की गयी जानकारी के मिलान के बाद ही एक संयुक्त पहचान संख्या जारी करने की तरफ कदम बढ़ाया था. आज जिस तरह से हर जगह पर सुरक्षा और गलत पहचान को रोकने के लिए विभिन्न प्रकार के पहचान पत्रों को उपयोग में लाया जाता है तो आने वाले समय में इसे रोकने के लिए भी आधार से व्यापक मदद मिलने वाली है. देश के अंदर अब हर नागरिक के पास आधार होना अनिवार्य होने से सरकार के लिए उसकी पहचान देश भर में सुनिश्चित की जा सकती है. भारत सरकार ने जिस तरह से अपने कर्मचारियों की उपस्थिति भी आधार संख्या से जोड़ने की शुरुवात की है उससे यही पता चलता है कि यदि राजनीति से ऊपर उठकर लोगों तक लाभ पहुँचाने के लिए आधार को हो आधार माना जाये तो पूरे देश में परिवर्तन आ सकता है.              
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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