यूपी और दर्ज़े वाले मंत्री

                                           यूपी में सरकार बनाने पर अपने नेताओं को विभिन्न आयोगों और संस्थानों में अध्यक्ष बनाकर मंत्री या राज्य मंत्री का दर्ज़ा देने की प्रक्रिया बहुत समय से चली आ रही है और यह राज्य सरकार के विवेक पर ही निर्भर किया करता है कि सरकार बनने वह अपने नेताओं को किस तरह से उपकृत करती है. वर्तमान सरकार ने यूपी में राज्य के आकर को देखते हुए सौ से अधिक लोगों को इस तरह की सुविधाओं ने युक्त कर रखा था और पहली बार मई में चुनावों में दयनीय प्रदर्शन के बाद जिस तरह से ३७ लोगों से यह सुविधा वापस ली गयी थी कल उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए ८२ और लोगों को इस सुविधा से वंचित कर दिया गया है. सपा सरकार के बनने पर प्रदेश भर में उसके कार्यकर्ता और समर्थक जिस तरह से रोज़ ही कानून व्यवस्था की खिल्ली उडाया करते हैं उसके बाद सरकार के लिए इस विषय पर भी सोचना आवश्यक हो गया है क्योंकि जनता सपा के शासन में इस समस्या से हर बार ही त्रस्त रहा करती है.
                                          लोकसभा चुनावों में हार के बाद जिस तरह से अखिलेश यादव ने अपनी सरकार के कामकाज को सुधारने की कोशिशें शुरू की हैं उससे यही लगता है कि सपा का शीर्ष नेतृत्व भी पार्टी की इस तरह की स्थिति से चिंतित है और आने वाले समय में उसे अब धरातल पर सरकार के वजूद को दिखाने की मजबूरी सामने आ गयी है. बागपत में जिस तरह से मंत्री का दर्ज़ा पाये नेता के परिवार वालों ने पुलिस कर्मियों से अभद्रता की उसके बाद अखिलेश को इन रेवड़ी वाले पदों पर बैठे हुए लोगों से मुक्ति पाने का एक आसान रास्ता भी खुलकर सामने आ गया और उन्होंने पुनर्गठन करने के नाम पर इस पूरे समूह को ही बर्खास्त कर दिया और केवल चुनिंदा लोगों को ही इसे अलग रखा जो कि संवैधानिक पदों पर बैठे हुए हैं. सरकार की उपस्थिति को दर्शाने के लिए बांटे जाने वाले इन पदों का जिस तरह से दुरूपयोग शुरू हो चुका है उसके बाद सरकार के पास इनके पुनर्गठन या अस्तित्व पर सोचने का समय आ गया है.
                                       इन पदों पर बैठने वाले लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह होती है कि उन पर प्रदर्शन का कोई दबाव नहीं होता है और वे राज्य के ख़ज़ाने पर बोझ ही बने रहते हैं. अब इस तरह से अनावश्यक पदों पर पुनर्विचार की आवश्यकता के साथ उनके काम काज की समीक्षा की उचित व्यवस्था भी की जानी चाहिए जिससे जिस संस्थान को वे राजनैतिक रूप से संभाल रहे हैं उसके सुधार के लिए उनके सहयोग के बारे में सरकार को भी सही जानकारी मिल सके. राज्य के संसाधनों के किसी भी तरह के दुरूपयोग को सही नहीं ठहराया जा सकता है और इतने अधिक अनावश्यक सजावटी पदों के स्थान पर अब मंत्रिमंडल में प्रभावी लोगों को शामिल कर उसे सही स्वरुप देने की अधिक आवश्यकता है. यूपी जैसे कानून व्यवस्था के मोर्चे पर चुनौती वाले राज्य में एक पूर्ण कलिक गृह मंत्री की भी आवश्यकता होती है यह संभवतः अखिलेश और सपा को समझ में नहीं आता है क्योंकि सीएम इतने महत्वपूर्ण विभाग के साथ अपनी व्यस्तता के कारण पूरा समय नहीं दे सकते हैं और उसका असर विभाग पर पूरी तरह से दिखाई भी देता है.          
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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