राज्यपाल- अधिकार और कर्तव्य

                                                                         यूपी में एक बार फिर से राज्यपाल राम नाइक की सक्रियता राजनैतिक विवादों को जन्म देने का काम कर रही है और सत्ता के गलियारों में फिर से यह चर्चा सुनाई देने लगी है कि सरकार और राज्यपाल के बीच बढ़ती हुई तल्खी किसी अशोभनीय स्थिति को भी जन्म दे सकती है. देश में आज़ादी के बाद के कई दशकों तक राज्यपाल की भूमिका पर कोई उंगली नहीं उठाई जाती थी क्योंकि तब केंद्र और राज्यों में कांग्रेस का शासन होने से इस तरह की स्थितियां पनपने ही नहीं पाती थीं तथा दूसरे राज्यों के वरिष्ठ नेताओं को राज्यपाल बनाकर अन्य राज्यों में भेजा जाता था जिससे वहां पर सत्ता प्रतिष्ठान के साथ किसी भी तरह के टकराव की कोई गुंजाईश ही नहीं होती थी पर जब से केंद्र के घोर विरोधी दलों के पास राज्यों की सत्ता होने का चलन बढ़ा है तभी से राज्यपालों की भूमिका पर भी प्रश्नचिन्ह लगने शुरू हो गए हैं और संविधान ने उनके जिस विवेक की बात कही है वह कहीं न कहीं राजनैतिक हितों की पूर्ति का साधन बनने लगी है.
                                            कर्नाटक के बहुचर्चित एसआर बोम्मई मामले में यह बात सामने आई थी कि केंद्र अपने राजनैतिक हितों को साधने के लिए विरोधी दलों द्वारा संभाले जा रहे राज्यों में अनावश्यक दखल किया करता है और यह प्रक्रिया सामान्य रूप से चलती ही रहती है. राजनैतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्यों में केंद्र सरकार सक्रिय रह सकने वाले लोगों को ही इस पद पर बैठाने काम किया करती है जिससे उनके बहाने ही वह राज्य सरकार को निशाने पर लेती रह सके. केंद्र में बैठा हुआ हर दल इसका दुरूपयोग करने की कोशिश करता रहता है तो इस स्थिति में यह प्रश्न भी उठना स्वाभाविक है कि आखिर राज्यों में राजयपालों की प्रासंगिकता क्या है और आखिर इसे कब तक वरिष्ठ नेताओं को उपकृत करने का साधन माना जाता रहेगा ? क्या यह आवश्यक नहीं है कि अब समय के अनुसार राज्यपालों के होने और न होने की स्थिति पर भी विचार किया जाये जिससे समय प्रशासनिक कार्यों में इस तरह का दखल पूरी तरह से रोका जा सके ?
                                              पहले विकल्प के रूप में राज्यपालों के पद को समाप्त किये जाने के बाद एक बड़ी समस्या सामने आ सकती है कि प्रदेशों में राज्य सरकार को शपथ कौन दिलवाएगा तो यह काम सीधे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से भी कराया जा सकता है क्योंकि संवैधानिक रूप से यह पद ऐसा होता है कि जिस पर कोई विवाद नहीं खड़ा किया जा सकता है और जो भी व्यक्ति इस पद पर बैठा होता है उसके पास राजनैतिक हितों को साधने का समय भी नहीं होता है. दूसरे विकल्प के रूप में संसद को यह अधिकार दिया जाना चाहिए कि वह राज्यपालों के पैनल के लिए देश के शीर्ष राजनेताओं, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, वैज्ञानिकों, सेना तथा पुलिस बलों के पूर्व अधिकारियों के एक समूह को बनाये जिसमें से ही राज्यपालों की नियुक्ति को संसद की मंज़ूरी के बाद ही अंतिम रूप दिया जाये तथा आवश्यकता पड़ने पर किसी भी राज्यपाल को संसद द्वारा ही वापस बुलाया जाये जिससे राजनैतिक रूप से इस पद के दुरूपयोग की सभी संभावनाओं पर रोक भी लगायी जा सकेगी और अनावश्यक रूप से विवादों के जन्म से भी बचा जा सकेगा.        
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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