समाजवादी पेंशन- आरक्षण और राजनीति

                                                                 लगता है कि यूपी में अखिलेश यादव के नेतृत्व में चल रही समाजवादी सरकार का कानूनी विभाग सही ढंग से काम नहीं कर रहा है जिसके चलते सरकार को कई बार हाई कोर्ट समेत अन्य स्थानों पर कानूनी झिड़की सुनने को मिलती रहती है. सामान्यतया नियम यह है कि किसी भी नए अध्यादेश या कानून को बनाते समय उसके सभी कानूनी पहलुओं की जांच की जाती है और कानून को अंतिम रूप देने से पहले इन पर अच्छी तरह से विचार कर लिया जाता है. पहले देश में ऐसी स्थिति नहीं थी और सरकारें जो कुछ भी करती थीं उनका कोई विरोध नहीं किया जाता था. आज वैसी स्थिति नहीं रह गयी है और शिक्षा के साथ सामाजिक और कानूनी जागरूकता बढ़ने के कारण आज सरकारों के बड़े बड़े फैसलों को भी कानूनी समस्याओं का सामना करना पड़ जाता है जिससे सरकार के उन प्रयासों में विलम्ब तो होता ही है साथ ही उनकी मंशा भी अधूरी रह जाती है.
                                                             ताज़ा प्रकरण में जिस तरह से लखनऊ स्थित एक एनजीओ हिन्दू फ्रंट फॉर जस्टिस ने ७ फरवरी २०१४ को जारी शासनादेश को चुनौती दी है उससे यह मामला अनावश्यक रूप से धार्मिक आधार पर बंट गया है. इस अध्यादेश में सरकार ने समाजवादी पेंशन के नाम पर शुरू की गयी योजना में अल्पसंख्यकों को २५% आरक्षण दिए जाने का प्रावधान किया गया है और इस आरक्षण के पेंच के कारण ही यह योजना आज विवादों के घेरे में आ चुकी है. कोर्ट ने इस मुद्दे पर सरकार से चार हफ्ते में जवाब भी माँगा है जिस पर सरकार को अपने पक्ष को रखने में मदद मिलने वाली है. सरकार को पूरे समाज या उसके किसी भी पिछड़े या वंचित वर्ग के लिए इस तरह की योजनाएं चलाने का अधिकार संविधान द्वारा दिया गया है पर आज इस प्रावधान का अधिकतर राज्यों में राज्य सरकारें मनमाने तरीके से दुरूपयोग करने में लगी रहती हैं जिससे उन वंचितों को लाभ मिलने में और भी अधिक देर होती है.
                                 कोर्ट ने आरक्षण के मुद्दे पर केवल संवैधानिक प्रावधानों के आरक्षण सम्बन्धी उल्लंघन पर ही जवाब माँगा है क्योंकि सरकार के सामान्य कार्यों में कोई भी कोर्ट अनावश्यक दखल नहीं दिया करती है पर जब कानूनी तौर पर संवैधानिक पेंच फँस जाय करता है तो उसे सरकार से जवाब मांगने पड़ते हैं. अच्छा होता कि इस योजना में सरकार ने इस तरह के किसी भी प्रावधान को करने से पहले अल्पसंख्यकों समेत पूरे राज्य में ईमानदारी से पात्र व्यक्तियों का चयन करने में पूरी शक्ति लगायी होती जिससे उन तक इस योजना का लाभ पहुँचाया जा सकता पर उसके स्थान पर लोकसभा चुनावों से पहले सरकार ने इसमें विशेष रूप से अल्पसंख्यकों के लिए व्यवस्था कर अच्छी योजना का भी कबाड़ा कर दिया है. हालाँकि कोर्ट ने योजना पर रोक लगाने से मना कर दिया है पर याचिकाकर्ता को साथ ही यह छूट भी दी हैं कि यदि सरकार इस आधार पर चयन करती है तो वह मामला कोर्ट के संज्ञान में लाकर उस पर अलग से आदेश लिया जा सकता है. इस घटना से एक बार फिर से यह स्पष्ट हो जाता है कि आने वाले समय में हमारे नेता सुधरने वाले नहीं हैं और वे इसी तरह से अनावश्यक रूप से पहले से ही काम के बोझ से दबे कोर्ट का समय ख़राब करने वाले हैं.       समाजवादी पेंशन- आरक्षण और राजनीति
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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