बर्द्धमान की धमक

                                                  दो अक्टूबर के दिन पश्चिम बंगाल के बर्द्धमान जिले में जिस तरह से बंगाल को आतंकी साज़िश का शिकार बनाने वाले आतंकियों की गलती उन पर भारी पड़ी और वे बड़ी साज़िश को अंजाम देने से पहले ही सुरक्षा बलों के निशाने पर आ गए उससे यही पता चलता है कि देश में आतंकियों ने अपने मंसूबों को पूरा करने के लिए सभी प्रयास पूरी तरह से जारी रखे हुए हैं. पहली दृष्टि में मामला साधारण लग रहा था पर जिस तरह से इसकी परतें खुलनी शुरू हुई तो यह बात सामने आई कि यह एक बहुत बड़ी साज़िश का हिस्सा थीं और इसके तार बांग्लादेश तक से जुड़े हुए थे. इस तरह के मामलों में जिस तरह से एनआईए के द्वारा जांच को प्राथमिकता दी जानी चाहिए इस बार भी उस पर राजनीति शुरू हो चुकी है केंद्र सरकार और अन्य एजेंसियां इसकी जांच जहाँ एनआईए से कराने के पक्ष में हैं वहीं राज्य की ममता सरकार इसे राज्य के ढांचे पर केंद्र का अतिक्रमण बता रही है जबकि इस तरह की परिस्थितियों में घटिया राजनीति का कोई स्थान नहीं होना चाहिए.
                                    देश में एनआईए के पास जिस तरह से संसाधन और कुशलता है वैसी राज्य स्तरीय किसी भी एजेंसी के पास नहीं है तभी पिछली संप्रग सरकार ने राष्ट्रीय हित में इस एजेंसी को मज़बूत किये जाने पर विशेष बल दिया था परन्तु तब आज की टीएमसी की तरह तब भाजपा को भी यह राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण लगा करता था और इस मसले पर राज्यों की सरकारें केंद्र पर आरोप लगाया करती थीं. आज वही स्थिति केंद्र में सत्ता संभाल रही भाजपा के सामने आ चुकी है और उसे भी वैसा ही लग रहा है जैसा संप्रग सरकार को लगा करता था ? इस तरह मसलों पर तब विपक्ष में बैठी भाजपा ने राष्ट्रवाद का ढोल पीटते हुए बहुत बार केंद्र सरकार को नीचे दिखाने की कोशिशें की और एनआईए पर भी आरोप लगाये पर आज उसे यह सब समय की मांग लग रही है तो उसकी इस बदली हुई मानसिकता को अवसरवाद कहा जाये या फिर ह्रदय परिवर्तन ?
                                         देश की सुरक्षा से जुड़े किसी भी मसले पर किसी भी तरह की राजनीति करने से सभी राजनैतिक दलों को बचना चाहिए यह बात हमारे नेता आज तक नहीं समझ पाये हैं. इस मामले की गंभीरता को देखते हुए भी त्वरित निर्णय लेने का हल्ला मचाने वाली राजग सरकार आज तक कोई फैसला नहीं कर पायी है कि उसे एनआईए से इसकी जांच करानी चाहिए या नहीं ? इस तरह के मसलों पर भी ठिठकती हुई केंद्र सरकार आखिर पिछली सरकार से किस तरह से भिन्न है यह जनता को समझ में नहीं आ रहा है क्योंकि जिन मुद्दों पर कभी भाजपा आक्रामक रहा करती थी आज उन्हीं मुद्दों पर वह अनिर्णय का शिकार लगती है. राष्ट्रीय मुद्दों पर जिस तरह से आज भी निर्णय लेने में देरी की जाती है उससे यही लगता है कि खुद सरकार में भी इन मुद्दों पर मतभिन्नता है क्योंकि यदि सभी में एकजुटता होती तो आज यह विलम्ब नहीं दिखाई देता. फिलहाल तो ममता सरकार को एनआईए को भी जांच की छूट देनी चाहिए क्योंकि देश से जुड़े हुए मसलों में राजनैतिक हितों को साधना अंत में देश की व्यवस्था पर ही भारी पड़ता है.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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