आईएस और भारतीय युवा

                                                                  इराक और सीरिया में इस्लाम के नाम पर खिलाफत को शुरू कर जिहाद करने वाले संगठन आईएस के प्रति तो भारत सरकार का रवैया देश की मंशा के अनुरूप ही रहा है पर जिस तरह से अमेरिका यात्रा से पहले और वहां पर भी अपने सम्बोधन में पीएम ने भारतीय मुसलमानों की देश के प्रति वफ़ादारी पर किसी भी तरह का संदेह करने से इंकार कर दिया और कहा कि देश का मुसलमान देश के लिए जीता है और देश के लिए ही मारना चाहता है उसके बाद से सरकार की बदलती हुई प्राथमिकता में यह बात भी सामने आ गयी है. कथित तौर पर यह माना जा रहा है कि आईएस की तरफ से लगभग २० भारतीय युवा मुस्लिम जिहाद में शामिल हैं और आज भी उनकी सही संख्या के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता है तो इस स्थिति में भारत सरकार क्या कदम उठा सकती है ? इन भारतीय युवाओं का किस तरह से आईएस से संपर्क हुआ यह आज भी रहस्य ही है पर कुछ भारतीय वहां हैं और एक की मौत भी हो चुकी है यह बात पुष्ट हो चुकी है.
                                                      यूएन के नियमों के तहत एनआईए ने जिस तरह से गृह मंत्रालय से आईएस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज़ करने की अनुमति मांगी है उसके बाद गृह मंत्रालय में इस बात पर विचार शुरू हो चुका है कि आईएस के साथ लड़ने वाले युवा यदि भारत वापस आना चाहते हैं तो उनके साथ किस तरह का व्यवहार किया जाये ? मंत्रालय में एक विचार संभवतः इस बात पर भी चल रहा है कि इन युवाओं ने भारत में किसी कानून का उल्लंघन नहीं किया है तो इनको सुधरने का अवसर दिया जाना चाहिए और उन पर कानूनी नज़र रखने की शर्त के साथ सामान्य ज़िंदगी जीने की छूट दी जानी चाहिए क्योंकि ऐसा करने से संभवतः घर वालों के दबाव में ये युवा अपने वर्तमान मार्ग को छोड़ने के लिए राज़ी भी हो जाएँ तो उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की जाये तथा एक अवसर के साथ उन्हें आम लोगों की तरह ही रहने दिया जाये. कानूनी तौर पर देखा जाये तो इनके खिलाफ भारत में कोई अपराध दर्ज़ नहीं है और किसी अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी द्वारा भी इनकी कोई मांग नहीं की गयी है तो यह कर पाना गृह मंत्रालय के लिए कोई बड़ा काम नहीं है.
                                                      पीएम और एचएम के बीच पहुंची अब इस बात पर कोई अंतिम निर्णय लिया जा सकता है और यदि सरकार इनके खिलाफ किसी भी तरह की कोई कार्यवाही नहीं करती है तो इससे इनके परिवारों और आईएस से सहानुभूति रखने वाले अन्य लोगों के बीच यह सन्देश भी चला ही जायेगा कि यदि किसी दबाव में उन्होंने आईएस को ज्वाइन कर लिया था तो उनके भारत लौटने पर किसी तरह का कोई अन्य खतरा सरकार की तरफ से नहीं है. पिछले दिनों आईएस की तरफ से लड़ रहे ठाणे निवासी आरिफ मज़ीद की मौत होने के बाद उसके परिवार वालों ने गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मिलकर उन लोगों के खिलाफ कार्यवाही करने की मांग की थी जिनके बहकावे में आयकर उनके बेटे ने यह आत्मघाती कदम उठाया था. इस घटना के बाद ही संभवतः गृह मंत्रालय में मानवीय आधार पर इन युवाओं को सुधरने का एक अवसर देने पर विचार आरम्भ हुआ है. यदि सरकार इनको आम ज़िंदगी जीने का हक़ देती है और उन असली दोषियों को खोजने का काम करती है जिनके कहने पर ये इराक गए थे तो देश की सुरक्षा के लिए वह अधिक महत्वपूर्ण काम हो सकता है.
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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