कोयला आवंटन और संसद

                                                              सुप्रीम कोर्ट द्वारा १९९३ से लेकर २०१० तक आवंटित किये गए २१८ कोल् ब्लॉक्स में से केवल चार सरकारी कम्पनियों के आवंटन के अतिरिक्त सभी को निरस्त करने का जो फैसला सुनाया गया है उससे आने वाले समय में पूरे परिदृश्य पर असर पड़ना ही है पर जिस तरह से आज भी नीतियों के मामले में सरकार पुरानी नीतियों पर ही चलने का काम किया करती हैं तो उस परिस्थिति में सब कुछ समय के अनुसार कैसे चल सकता है यह भी बड़ा प्रश्न बनकर सामने आ चुका है. यह सही है कि आर्थिक रूप से विपन्न भारत में जब १९९१ से उदारीकरण का दौर चला तो उसके बाद सरकार और देशी उद्योगों के पास इतना धन नहीं था कि वे इतनी बड़ी परियोजनाओं को अपने दम पर चला पाने सफल होते जिससे प्रारम्भ में सरकार ने इस क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देने के लिए नीलामी के स्थान पर केवल आवंटन को ही प्राथमिकता देने का नियम बनाया था जो कि उस समय के अनुसार सही कहा जा सकता है पर आज के प्रतिस्पर्धी युग में इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी.
                                                              निश्चित तौर पर समय के साथ कानून और आवंटन प्रक्रिया को पुरानी तरह से चालू रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषन ने जिस तरह से इनकी कमियों को पकड़ते हुए आवंटन पर ही सवालिया निशान लगाया था उसके बाद ही यह सब सामने आ पाया. देश के उद्योगपति और नेता किस गठजोड़ के तहत काम किया करते हैं यह इससे एक बार फिर से स्पष्ट हो गया है. यहाँ पर एक बात और भी महत्वपूर्ण है कि सरकारी स्तर पर हर मंत्रालय की संसदीय समिति होती है जो कि मंत्रालय के कामों पर अपनी राय भी दिया करती है पर इन उन्नीस सालों में अलग अलग सरकारों के समय कोयला मंत्रालय की इस समिति ने क्या कुछ किया या ये समितियां किस तरह से काम किया करती हैं सब सामने आ गया है ? आखिर जनता के पैसों पर संसद में बैठक बुलाने के लिए इन समितियों को भी आड़े हाथ क्यों नहीं लिया जाना चाहिए जिनकी नाक के नीचे इस तरह का काम सदैव चलता ही रहता है ?
                                                              इससे एक महत्वपूर्ण बात और भी स्पष्ट होती है कि बड़े नीतिगत परिवर्तनों के अतिरिक्त सरकार नेताओं के स्थान पर अधिकारी ही चलाया करते हैं यह बात भी देश को पता चल गयी है. इतने लम्बे अंतराल में देश के सभी दल बारी बारी से किसी न किसी तरह से सत्ता का सुख भोगते रहे हैं फिर भी किसी ने इस कमी की तरफ ध्यान ही नहीं दिया जो देश के अधिकारियों की नेताओं पर सर्वोच्चता को ही नहीं दर्शाता है ? अब समय है कि इस तरह की किसी भी गतिविधि को केवल अहं पोषण से आगे बढ़कर देश के हित में निर्णय लेने की तरफ बढ़ाया जाना चाहिए जिससे किसी भी क्षेत्र के विशेषज्ञों की राय भी इनमें शामिल की जा सके. संसदीय समितियों के औचित्य पर चूंकि इस बार फिर से प्रश्न चिन्ह लग गया है तो इनके गठन और आवश्यकता पर भी विचार किये जाने की ज़रुरत है जिससे पूरे तंत्र को भविष्य के लिए और भी चौकन्ना किया जा सके. आर्थिक और क्षेत्र विशेष की समस्याओं और उनके समाधान के लिए विशेषज्ञों की राय को नेताओं और समितियों की राय से ऊपर रखने के बारे में भी सोचना चाहिए जिससे देश के संसाधनों की लूट को नेता सोते हुए देखते न रहें.       
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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