जन-धन योजना सफलता और समस्याएं

                                                                                             देश के हर नागरिक के पास अपना एक बैंक खाता हो और उसके बारे में सरकार को भी पूरी जानकारी हो इस प्रयास के तहत ही १५ अगस्त को पीएम द्वारा घोषित की गयी जन धन योजना ने अपने पहले चरण को जिस सफलता के साथ पूरा किया है वह अपने आप में महत्वपूर्ण है फिर भी इस योजना को बनाते समय जिन मूलभूत बातों को ध्यान में रखना चाहिए था उस पर सरकार की निगाह ही नहीं गयी जिसके कारण आज देश के किसी भी बैंक में इस योजना का खाता खुलवाना अपने आप में एक बड़ी चुनौती बन गया है. लखनऊ में दैनिक समाचार पत्र अमर उजाला द्वारा विभिन्न बैंकों की शाखाओं में जाकर जिस तरह से योजना के अंतर्गत खोले जाने वाले खातों के बारे में प्रयास किये उससे बैंक कर्मियों की इस योजना के बारे में दिलचस्पी का ही पता लगता है. किस तरह से एक बेहतर सरकारी प्रयास केवल हल्ला बोल शैली में सामने आता है इस पर भी आज विचार किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक योजना की समस्याओं पर विचार नहीं किया जायेगा तब तक उसकी सफलता संदिग्ध ही रहने वाली है.
                                                                        योजना की घोषणा करने के एक महीने बाद सरकार ने बैंकों के आर्थिक हितों के बारे में सोचा और उन्हें यह अनुमति भी दी जिसके अंतर्गत पहले से खुले खातों को भी एक फॉर्म भरने के बाद इस योजना में शामिल किया जा सकता है जबकि यह बात पहले ही घोषित होनी चाहिए थी. सरकारी योजना में पीएम के आदेश पर बैंकों के लिए काम करना उनकी मज़बूरी है पर इस योजना में जिस तरह से डेबिट कार्ड युक्त खातों के लिए सरकार ने कोई विचार नहीं किया उससे बैंकों पर और अधिक आर्थिक बोझ भी पड़ा है. यदि पहले से बने ग्राहकों के सामने यह विकल्प होता तो संभवतः बैंकों में आने वाली इस भीड़ से बचा जा सकता था और पहले से ही खाताधारी लोगों को बाद की समय सीमा देकर औपचारिकताएं पूरी करने के लिए कहा जा सकता था. इस पूरी योजना से निश्चित तौर पर डीबीटी को ही लाभ मिलने वाला है जिसके शुरू होने से सब्सिडी और अन्य मानकों पर होने वाले भ्रष्टाचार से लड़ने में देश और सरकार को पूरी मदद मिलने की सम्भावना भी है.
                                             बैंकों में आज वैसे ही काम का इतना अधिक बोझ हो चुका है कि उनसे निपट पाना उनके लिए बड़ी चुनौती है और जब इस तरह की महत्वाकांक्षी योजना बिना आर्थिक और प्रशासनिक पहलुओं को ध्यान में रखे हुए शुरू कर दी जाती हैं तो काम का बोझ और भी बढ़ जाया करता है. आशा है कि आने वाले समय में बैंक अपने इन अन्ये ग्राहकों के लिए नयी सुविधाएँ आने पर मानवीयता के साथ काम करना सीख पायेंगें और सरकार से भी यह अपेक्षा की जाती है कि देश के विराट स्वरुप को देखते हुए इस तरह की कोई भी योजना लम्बे समय तक और प्रतिदिन की सीमित संख्या के आधार पर शुरू की जानी चाहिए. देश के बैंकों के सामान्य काम काज पर इस योजना का कितना दुष्प्रभाव पड़ा है इसक अांकलन संभवतः अभी सरकार भी नहीं कर पायी है क्योंकि जिस तरह से एक योजना को लेकर रिकॉर्ड बनाने की कोशिश की गयी उसकी कोई आवश्यकता ही नहीं थी और प्रतिदिन बैंक के स्टाफ और क्षमता के अनुसार १०० या २०० नए खाते खोलने की प्रक्रिया को शुरू किया जा सकता था. फिर भी यह योजना अपने उद्देश्य को प्राप्त कर आम लोगों तक पहुँच बनाने में सफल हो ऐसी कामना ही की जा सकती है.                       
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

About Dr Ashutosh Shukla

Only simple.....
यह प्रविष्टि अधिकार, उपयोग, कर्तव्य, नियम, संसाधन, समाज, सरकार, सुधार में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s