लव, जिहाद और राजनीति

                                                                         पिछले कुछ दिनों से जिस तरह से अंतर्धार्मिक विवाह करने वाले अचानक से देश की राजनीति में सुर्खियां बटोरने लगे हैं उससे यही लगता है कि नेताओं के लिए कोई भी विषय अछूता नहीं हुआ करता है और आने वाले समय में सभी दलों के नेता समाज की इस कमज़ोर नस का लाभ उठाने की पूरी कोशिश करने वाले हैं. यह सही है कि प्रेम में धर्म, जाति, वर्ग और समाज का कोई स्थान नहीं होता है जिसके कारण अलग-अलग पृष्ठभूमि से आने वाले लोग कितनी आसानी से एक दूसरे के साथ ज़िंदगी बिताने का रास्ता खोज लेते हैं और अधिकांश मामलों में यह सफल भी होता दिखाई देता है. हिन्दू विवाह अधिनियम के अनुसार कोई भी व्यक्ति आसानी से दूसरी शादी नहीं कर सकता है पर क्या देश में ऐसे अनगिनत उदाहरण नहीं मौजूद हैं जिनमें लोगों ने सिर्फ दूसरा विवाह करने के लिए इस्लाम धर्म को अपना लिया और विवाह करके केवल कानून की आँखों में धुल झोंकने में सफलता पायी ? इन लोगों के सामाजिक रुतबे के चलते कोई भी इनके इस तरह से स्वार्थी धर्म परिवर्तन पर ध्यान नहीं देना चाहता है ?
                                                                      भाजपा और उसके सहयोगी संगठन जिस तरह से इस मामले को उठाने में लगे हुए हैं और इसे कानून व्यवस्था तक से जोड़ने में लगे हुए हैं उस स्थिति में केंद्रीय गृह मंत्री का लव जिहाद शब्द के बारे में इतनी उत्सुकता से पूछना क्या दर्शाता है ? क्या गृह मंत्री को यह भी नहीं पता है कि उनकी पार्टी क्या करने में लगी हुई है या फिर वे इस शब्द का इस्तेमाल केवल अपने राजनैतिक हितों तक ही करना चाहते हैं और उसके आगे अपने को खुले विचारों वाला साबित करना चाहते हैं ? यदि निस्वार्थ प्रेम है तो उसका कोई विरोध नहीं किया जाना चाहिए पर जिन भी लोगों ने दूसरे धर्मों के लोगों से प्रेम के नाम पर विवाह किया और यदि वे उन पर धर्म परिवर्तन करने के लिए दबाव बनाते हैं तो उसे कानून भी मान्यता नहीं देता है और उसके लिए सजा का भी प्रावधान है. जो लोग प्रेम का धर्म परिवर्तन के लिए दुरूपयोग कर रहे हैं उनका किसी भी स्तर पर कोई समर्थन नहीं किया जा सकता है खुद देश के एक शीर्ष मुस्लिम धर्म गुरु ने भी इस मानसिकता को गलत बताया है साथ ही इसमें शामिल लोगों को कड़ी सजा देने की बात भी कही है.
                                                                     समाज में समानता और समरसता के मायने वे लोग नहीं समझ सकते हैं जिनके लिए इस तरह के मुद्दों में शामिल होना ही बड़ी बात है क्योंकि यदि समाज में इस तरह के विवाह होते हैं तो उससे एक दूसरे की संस्कृति को जानने का अवसर मिलता है पर साथ ही यह भी आवश्यक है कि विवाह में बंधने वाले अपने धर्मों का परिवर्तन किसी के दबाव में आकर न कर रहे हों ? यदि प्रेम व्यक्ति से है तो उसकी धार्मिक भावनाएं बीच में नहीं आनी चाहिए और देश के कानून में भी इस तरह के विवाहों के लिए कोई अलग कानून बनाया जाना चाहिए जिससे महिला के अधिकार सुरक्षित रह सकें और उनको ज़िंदगी में किसी भी तरह से अचानक से अकेला न छोड़ा जा सके. इस तरह के विवाह को पंजीकृत करने के लिए अलग व्यवस्था हो और जिन दो धर्मों के लोग विवाह कर रहे हैं कानून उनके धर्मों के अतिरिक्त एक नए कानून के तहत इन विवाहों का फैसला करने की बात करे. जब किसी को इतना प्रेम है कि वह अपनी धार्मिक आस्थाओं से बाहर जाकर शादी करने को तैयार है तो उस पर किसी भी विवाद की स्थिति में उनके धार्मिक कानून से भी ऊपर उठने का साहस तो होना ही चाहिए.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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