राहत कार्य और तैयारियां

                                                        एक बार फिर से जम्मू कश्मीर की बाढ़ के बाद सब कुछ वैसा ही दिखाई देने लगा है जैसा कि पिछले वर्ष उत्तराखंड में और उससे पहले लेह में भी देखा जा चुका है. देश में प्राकृतिक आपदाओं के समय हमारी पूरी व्यवस्था किस तरह से हर बार ही ध्वस्त होती नज़र आती है यह हमेशा ही दिखायी देता है. इस मामले में केवल उड़ीसा को अपवाद कहा जा सकता है क्योंकि वहां पर आपदाओं के लगातार आते रहने के बाद जिस तरह से नवीन पटनायक ने तटीय क्षेत्रों में स्थायी रूप से राहत और बचाव के सभी उपाय कर लिए हैं वे अपने आप में सम्पूर्ण ही लगते हैं क्योंकि पिछले वर्ष ही वहां आये तूफ़ान में जिस तरह से लोगों को बचाया गया वह अपने आप में मौसम विज्ञानं और राज्य सरकार का अभूतपूर्व काम ही था. आज भी देश के हर स्थान पर अलग अलग तरह की आपदाओं के चलते नागरिकों की सुरक्षा सम्बन्धी समस्याएं सामने आती ही रहती हैं और उनका स्थान विशेष पर बहुत ही बुरा प्रभाव भी पड़ता है. इससे निपटने के लिए अब स्थानीय स्तर पर ही सभी सुविधाएँ उपलब्ध कराने की तरफ सोचने की आवश्यकता बढ़ती ही जा रही है.
                                                  देश में पर्यावरण पर जिस तरह से राजनीति होती रहती है वह भी आज इस तरह की आपदाओं के लिए बहुत ही खतरनाक साबित होती है अभी तक केवल स्थानीय भ्रष्टाचार के कारण ही पर्यावरण की अनदेखी की जाती है और क्षेत्र विशेष के प्राकृतिक और भौगोलिक वातावरण की अनदेखी अपने आप में इस तरह की अदाओं को जन्म देने का काम करती हैं. सरकार के पास करने के लिए जो कुछ भी तंत्र के रूप में है वह किसी न किसी वजह से प्रभावित हो जाता है और उसके दुष्प्रभाव को बाद की पीढ़ियां झेलने के लिए अभिशप्त हो जाती हैं. वर्तमान राजग सरकार ने जिस तरह से पश्चिमी घाट के लिए पर्यावरण विशेषज्ञों की राय को अनसुना करने का मन बना लिया है वह भी आने वाले दशकों में ऐसा ही कुछ नहीं दिखायेगा इससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता है. नदियों के प्राकृतिक रूप से छेड़छाड़ करने से जो कुछ भी असामान्य बारिश के रूप में सामने आता यही वह आज हमें दिखाई भी दे रहा है.
                                                   देश ने संचार मामलों में बहुत अधिक तरक्की कर ली है और आने वाले समय में इसके और भी आगे बढ़ने की सम्भावना है पर क्या देश को केवल इस तरह के आधुनिकतम संचार तंत्र के भरोसे छोड़ा जा सकता है जबकि आपदा के समय ये हर बार ही काम करना बंद कर दिया करते हैं ? आज देश के बारहवीं कक्षा के छात्रों को हैम रेडियो के सञ्चालन का आवश्यक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए और हर एक ग्राम सभा स्तर पर सांसद या विधायक निधि से एक हैम रेडियो संचालक और उसकी अनुपस्थिति में एक सहायक की स्वैच्छिक नियुक्ति की जानी चाहिए. इस क्षेत्रों में यदि पहले से ही कोई हैम रेडियो संचालक मौजूद है तो उसके माध्यम से आपातकालीन संचार सेवाओं को सुनिश्चित किया जाना चाहिए. हैम रेडियो अपने आप में एक ऐसा उपकरण है जो सौर ऊर्जा से भी आसानी से संचालित हो सकता है. संभवतः कश्मीर जैसी स्थिति में सरकार और सेना इसके सञ्चालन की अनुमति नहीं दे सकेगी पर देश के अन्य भागों में तो इसके स्टेशन शुरू करने के बारे में सोचा ही जा सकता है.             
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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