जम्मू कश्मीर बाढ़ और सहायता

                                                                  पिछले पांच दशकों में आई जम्मू कश्मीर कि सबसे विनाशकारी बाढ़ के बाद जिस तरह से सेना ने अपने कर्तव्य का निर्वहन किया है वह अपने आप में अतुलनीय है क्योंकि जिन विपरीत परिस्थितियों में सेना को वहां पर काम करना पड़ता है वह सामान्य से बहुत अलग होती है. देश के किसी अन्य भाग में इस तरह की राहत और बचाव में केवल लोगों को बचाने में ही सेना का ध्यान होता है पर इस बार कश्मीर घाटी और जम्मू क्षेत्र में जिन इलाकों में बाढ़ आई हुई है वे आतंकी गतिविधियों से भी प्रभावित रहते हैं पर हमारी सेना ने जिस तरह से लोगों को बचाने के लिए रात में खुद को खतरे में डालकर भी बचाव कार्य जारी रखने का निर्णय लिया है वह अपने आप में बहुत ही अनूठा है. दिन में सामान्य प्रशासन और राष्ट्रीय आपदा प्रबन्ध टीम के साथ मिलकर जिस तेज़ी से सेना ने अपने काम को अंजाम देना शुरू किया है वह बहुत ही सराहनीय है क्योंकि घाटी में सेना की हर गतिविधि को संदेह की दृष्टि से देखने वालों ने संभवतः पहली बार सेना का यह चेहरा भी व्यापक रूप से देखा होगा.
                                                            राज्य के लिए इस संकट की घडी में केंद्र सरकार ने भी जिस तेज़ी के साथ दो दिन के अंदर ही गृह मंत्री और प्रधानमंत्री के दौरों को सुनिश्चित करते हुए २१०० करोड़ रुपयों की सहायता घोषित की है उससे राज्य के बचाव, राहत एवं पुनर्वास के लिए धन की कमी नहीं आने पायेगी. अब यह राज्य सरकार की मशीनरी पर निर्भर करता है कि वह कितनी तेज़ी से काम करते हुए औपचारिकताओं को पूरा करती है और जिन लोगों के लिए सहायता राशि आवंटित की गयी है उन तक कितनी जल्दी इसे पहुँचाने की व्यवस्था भी कर पाती है. केंद्र सरकार की तरफ से जो कुछ भी संभव है पूरे संसाधन राज्य को उपलब्ध करा दिए गए हैं और आने वाले समय में आवश्यकता पड़ने पर और भी सहायता का आश्वासन पीएम द्वारा दिया जा चुका है. राज्य की मशीनरी कितनी तत्परता के साथ काम करती है अब राहत का सारा दारोमदार इसी पर टिका रहने वाला है क्योंकि जो काम सेना के ज़िम्मे रहने वाला है वह तो शुरू भी हो चुका है और पानी उतरते ही उस पर और तेज़ी भी आ जाएगी.
                                                  अच्छा होगा कि राज्य सरकार केंद्र के साथ बेहतर समन्वय स्थापित करने के साथ ही पूरी तत्परता के साथ आगे बढ़कर लोगों कि सहायता करने के लिए हर संभव काम करें. केंद्र केवल सेना और आपदा प्रबंधन की टीमें और संसाधन ही जुटा सकता है और उनका सही तरह से सदुपयोग कर पाना तो राज्य सरकार के बेहतर प्रबंधन पर ही निर्भर करता है. देश में अभी भी यह संस्कृति नहीं पनप पायी है जिसमें अलग अलग दलों की सरकारें होने पर किसी तरह की राजनीति को आगे लाए बिना ही ज़मीनी हालातों में सुधार लाया जा सके. अब यह आपदा एक तरह से पूरे देश के लिए एक मिसाल भी बन सकती है क्योंकि जब तक दोनों सरकारों का समन्वय ही नहीं होगा तब तक किसी भी तरह से पीड़ितों को सहायता समय से नहीं पहुंचाई जा सकती है. जम्मू और घाटी के कुछ क्षेत्र ऐसे भी है जहाँ अक्टूबर महीने से ही कड़ाके की सर्दी शुरू हो जाती है तो उस स्थिति में उनके लिए अस्थायी आवासों कि व्यवस्था करना भी अपने आप में एक बड़ी चुनौती साबित होने वाला है फिर भी यदि सेना के साथ राज्य सरकार का सहयोग रहे तो इस क्षेत्र में कुछ ठोस पहल भी संभव है.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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