कारगिल का खुलासा

       कारगिल युद्ध के कारणों के बारे में आई एक रिपोर्ट में जिस तरह से इस बात का खुलासा किया गया है कि देश के ख़ुफ़िया तंत्र ने इस सम्बन्ध में २ जून १९९८ को ही भेजे एक पत्र में इस बात के बारे में आशंका जता दी थी कि सीमा पार पाकिस्तान की गतिविधियाँ सामान्य नहीं हैं और वहां पर सैन्य उपकरणों की मात्रा और तैनाती में फेरबदल किया जा रहा है. इस आंकलन में यह साफ़ तौर पर लिखा गया था कि पाक बड़ी संख्या में सैनिकों को वेश बदलकर भेज सकता है जिस कारण से बहुत बड़ी सुरक्षा सम्बन्धी समस्या पैदा हो सकती है. उस समय के इस छद्म युद्ध के समय यह कहा जा रहा था कि सेना और देश के ख़ुफ़िया तंत्र ने अपना काम ठीक ढंग से नहीं किया और पाक सेना ने इस तरह की बहुत बड़ी तैयारी कर ली जबकि हम सूचना मिलने के बाद भी ग़लतफ़हमी में जीते रहे कि अब तो परमाणु बम का विस्फोट कर लिया है और अब पाक से कोई भी ख़तरा नहीं है ? किसी पर आरोप लगाना तो ठीक नहीं है पर किन परिस्थितियों में इन संवेदनशील सूचनाओं की अनदेखी की गयी यह कोई नहीं जनता पर नेताओं ने हमेशा की तरह इसकी ज़िम्मेदारी लेने के स्थान पर बेशर्मी से पूरे प्रकरण को ख़ुफ़िया तंत्र की विफलता करार दिया ?
    देश की सुरक्षा से सम्बंधित इनपुट्स को राजग सरकार ने किस तरह से हलके में लिया अब यह ऐसा प्रश्न है कि जिसका जवाब किसी के पास नहीं है तत्कालीन प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री और गृह मंत्री ने इस तरह की सूचनाएँ  मिलने पर भी पूरे मामले को आख़िर किन रिपोर्टों के बाद हलके में लिया ? या कहीं ऐसा तो नहीं कि इन रिपोर्ट्स को भी अन्य सरकारी कागज़ों की तरह ही सामान्य रूप में लिया गया ? सेना ने किस हद तक इन रिपोर्ट्स को विश्वसनीय माना और आख़िर क्या कारण रहे जिनसे सेना इस मामले में सही प्रतिरोधात्मक तैयारियां नहीं कर पाई ? इस छोटी सी रणनीतिक भूल ने किस तरह हमारे वीर जवानों को बिना बात ही मौत के मुंह में धकेल दिया जो कुछ चौकसी से टाला जा सकता था उस पर भी सही ढंग से काम नहीं किया गया. और तो और किन परिस्थियों में सेना ने इतनी चुप्पी लगायी यह भी सोचने का विषय है. केवल वीरों के भरोसे कारगिल की लड़ाई जीतकर राजग दोबारा सत्ता में आने लायक बहुतमत तो पा गया था पर इन जवानों को शहीदों की श्रेणी में पहुँचाने वालों के लिए अब क्या किया जा सकता है ?
   अब देश में कुछ ऐसा किया जाना चाहिए जिससे इस तरह के इनपुट्स मिलने पर कोई एकीकृत कमान इस पर फैसला करे और केवल नेताओं पर देश की सुरक्षा के लिए भरोसा किया जाना बंद किया जाये इसका यह मतलब नहीं है कि सेना को निरंकुश होने दिया जाये पर नेताओं में भी ज़िम्मेदारी और ऐसे मामलों के प्रति सही निर्णय लेने की क्षमता का विकास किया जाये. देश की सुरक्षा और वह भी पाक और चीन की तरफ़ से होने वाली किसी भी गतिविधि पर पैनी नज़र रखने के लिए अब नेताओं को अपने आपको दुरुस्त करना ही होगा. आज चीन की तरफ़ से की जाने वाली किसी भी घटना पर हल्ला मचाने वाले नेता इस बात को भूल जाते हैं कि उनके शासन में पूरे घुसपैठियों ने २ महीने तक देश का जीना हराम कर दिया था और वे सोते रहे थे ? इस तरह के मामलों में केवल विशेषज्ञों को ही बोलना चाहिए और किसी भी नेता को यह अधिकार नहीं होना चाहिए कि वह सेना और देश से सम्बंधित मामलों में आम मसलों की तरह कुछ भी बोलना शुरू आकर दे ? अब समय है कि नेताओं की लगाम कसी जाये और हर दल के चुने हुए नेताओं को रक्षा सम्बन्धी मामलों की संसदीय समिति में स्थायी रूप से रखा जाये क्योंकि यह विषय ऐसा नहीं है जिसमें संसद की अवहेलना करने वाले सांसद चाहे जब आते जाते रहें.

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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